“कुष्ठ रोग से मुक्त व्यक्ति गौरव तक”
कभी था जिस्म पर दर्द का साया,
कुष्ठ रोग ने जीवन को रुलाया।
लोगों की नजरों में ठुकराया गया,
अपनों से भी दूर हटाया गया।
पर हिम्मत ने हार कहाँ मानी,
अँधियारी रातों में लौ जलाई।
इलाज से जब जीवन बदला,
फिर उम्मीदों ने रंग सजाई।
घाव भले ही अब भी बाकी हैं,
कुछ निशान कहानी कहते हैं,
पर वो अब डर नहीं, पहचान हैं,
संघर्ष की गाथा ही रहते हैं।
समाज ने जब हाथ बढ़ाया,
दिल ने फिर से जीना सीखा,
प्यार मिला तो ये समझ आया,
हर टूटा सपना फिर से दीखा।
अब वो खुद पर गर्व करता है,
हर कदम साहस से भरता है,
कहता है—“मैं कमजोर नहीं,
बस थोड़ा अलग, पर मजबूत हूँ।”
आओ उसे सम्मान दें हम,
उसकी जीत का गुणगान करें,
जो लड़कर आया है जीवन से,
उसका दिल से अभिनंदन करें।
???? लेखिका अनिता देवी शिक्षिका जिला पूर्वी चंपारण बिहार
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