जोड़ घटाव चला करता है जहाँ निवालों का।
स्वयं ढूँढना पड़ता उत्तर सभी सवालों का।
परछाई भी गुम हो जाती है अँधेरे में आकर,
सबको साथ कहाँ मिलता है सदा उजालों का।
©अमरेश सिंह भदौरिया
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