शुष्क अधरों पर जगे कुछ हसी अहसास फिर!
प्रेम का प्रतिदान लेकर आ गया मधुमास फिर!
रुत वासंती ने धरा पर.....इस कदर ढाया कहर,
आदमी तो आदमी.. ......आम तक बौरा गए!!
©अमरेश सिंह भदौरिया
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