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सावन और शिव

 

सावन और शिव

(भक्ति से व्यवहार तक)

✍️ अमरेश सिंह भदौरिया

सावन का महीना, भारतीय संस्कृति में केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं, अपितु आध्यात्मिक जागरण और आत्मशुद्धि का काल है। यह महीना भगवान शिव को समर्पित होता है—जो केवल 'देवों के देव' नहीं, बल्कि 'जन-जन के देव' भी हैं। सावन में उनकी भक्ति की लहर केवल मंदिरों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह जीवन की गहराइयों तक प्रवाहित होती है।

श्रावण मास, हिंदू पंचांग का पंचम महीना, सामान्यतः जुलाई-अगस्त में आता है। इसकी धार्मिक प्रतिष्ठा का आधार वह पौराणिक प्रसंग है, जब समुद्र मंथन से निकले कालकूट विष को पीकर भगवान शिव ने संसार की रक्षा की थी। तभी से यह विश्वास दृढ़ हुआ कि शिव ही विनाश और सुरक्षा—दोनों के संतुलनकर्ता हैं।

एक अन्य मान्यता के अनुसार, सावन में माता पार्वती ने शिव को पति रूप में प्राप्त करने हेतु कठोर तपस्या की थी। इसीलिए यह मास शिव-पार्वती के मिलन, समर्पण और तप की प्रतीक बन गया।

परंतु जो बात शिव को अन्य देवताओं से अलग करती है, वह है उनका सर्वसमावेशी और तटस्थ चरित्र—

देवता हों या राक्षस, मनुष्य हो या पशु, स्त्री हो या पुरुष—शिव सभी के आराध्य हैं।
देवताओं में केवल शिव ही ऐसे हैं, जिनकी उपासना देवता और असुर समान श्रद्धा से करते हैं।
यह समभाव, यह उदारता, यह सहजता—शिव को ‘महादेव’ बनाती है।

सावन सोमवार व्रत – अविवाहित कन्याएँ उत्तम वर के लिए और विवाहित महिलाएँ सौभाग्य की कामना से यह व्रत रखती हैं।

कांवड़ यात्रा – श्रद्धालु पवित्र नदियों से जल भरकर शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। यह त्याग और तपस्या का प्रतीक है।

रुद्राभिषेक और मंत्र जाप – यह मन, शरीर और आत्मा की शुद्धि का मार्ग है।

पारिवारिक पूजा और उपवास – यह संयम, श्रद्धा और सेवा भाव की जीवंत अभिव्यक्ति है।

आज जब समाज राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक विघटन से जूझ रहा है, तब शिव केवल आराध्य नहीं, एक व्यवहारिक दिशा हैं।

वैराग्य में स्थित होकर भी गृहस्थ धर्म निभाना,
तपस्वी होते हुए भी सहज-सरल रहना,
संहारक होते हुए भी कल्याणकारी बनना,
न्यायप्रिय होते हुए भी करुणा से भरा होना—
यही शिवत्व है।

आज के राजनेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों, शिक्षकों, न्यायाधीशों और समाज के नेतृत्वकर्ताओं को शिव से यही प्रेरणा लेनी चाहिए—
जब सत्ता वंचितों के विरुद्ध शस्त्र बन रही हो,
जब राजनीति स्वार्थ और छल का केंद्र बन गई हो,
जब क्रोध विनाश बनता जा रहा हो—
तब शिव का पथ ही समाज और राष्ट्र का कल्याण कर सकता है।

शिव की तरह पद नहीं, सेवा को लक्ष्य बनाइए।
शिव की तरह क्रोध को कल्याण में रूपांतरित कीजिए।
शिव की तरह न्याय का पक्ष लीजिए, न कि पक्षपात का।
शिव की तरह संघर्ष को मौन साधना बनाइए।

इस सावन, जल केवल शिवलिंग पर नहीं, अपने अंतर को भी शिवमय करने हेतु अर्पित करें — विचारों में उदात्तता, व्यवहार में करुणा और आचरण में संयम के रूप में।

???? हम यह संकल्प लें—

"मैं अपने भीतर शिव के गुणों को स्थान दूँगा—
जहाँ करुणा हो, समता हो, सेवा हो, सत्य हो,
और स्वार्थ के स्थान पर समाज हो।"

सावन केवल पूजा का समय नहीं, आत्मनिरीक्षण का अवसर है।
शिव की भक्ति मंदिर तक ले जाती है, पर शिव का चरित्र हमें समाज का दीपस्तंभ बना सकता है।
आइए, इस सावन हम शिव की केवल आराधना न करें, बल्कि उन्हें अपने भीतर जागृत करें।
क्योंकि जब-जब मनुष्य शिवत्व को अपने भीतर उतारता है,
तब-तब समाज रक्षित होता है, सत्ता शुद्ध होती है, और जीवन मोक्ष की ओर बढ़ता है।

"करचरण कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा
श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम्।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत् क्षमस्व
जय जय करुणाब्धे श्री महादेव शम्भो॥"

शिवापराध क्षमापन स्तोत्र, आदि शंकराचार्य

(हे शिव! जो भी अपराध मेरे हाथ, पाँव, वाणी, शरीर, श्रवण, नेत्र, मन या कर्म से हुए हों— उन्हें क्षमा कर दीजिए। आप करुणा के सागर हैं।)

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