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वर्चस्ववाद और प्रतिरोध का द्वंद्व

 

भक्तिकाल : वर्चस्ववाद और प्रतिरोध का द्वंद्व

✍️ अमरेश सिंह भदौरिया

हिंदी साहित्य के इतिहास को पढ़ते हुए अक्सर ऐसा महसूस कराया जाता है जैसे भक्तिकाल कोई बहुत शांत, निर्द्वंद्व और सुरम्य दौर था जहाँ समाज के सारे अंतर्विरोध एकाएक समाप्त हो गए थे। हमारी मुख्यधारा की आलोचना ने इस पूरे दौर को एक महान 'समन्वयवादी' लोक-जागरण की तरह देखने और दिखाने का अभ्यास बना लिया है। लेकिन जब हम उस समय के सामाजिक ढाँचे, आर्थिक विषमताओं, भाषा की राजनीति और दार्शनिक घमासान की तहों में उतरते हैं, तो यह चमकीली तस्वीर दरकने लगती है। सच तो यह है कि भक्तिकाल कोई बना-बनाया, एकरूपी या सहज सामंजस्य का कालखंड नहीं था। इसके भीतर प्राचीन काल से चली आ रही वर्चस्ववादी व्यवस्था और शोषित समुदायों की छटपटाहट के बीच एक अनवरत और तीखा संघर्ष चल रहा था। जब तक हम इतिहास के इन अंतर्विरोधों को उघाड़कर देखने का साहस नहीं जुटाएंगे, तब तक इस युग की असली नब्ज़ को पकड़ना नामुमकिन ही रहेगा।

हमारी आलोचना की सबसे बड़ी सीमा यह रही कि उसने सगुण परंपरा की मर्यादाओं, वर्णधर्म और शास्त्र-सम्मत नियमों को ही पूरे भक्तिकाल का एकमात्र पैमाना बना दिया। जब कबीर, रैदास या नानक जैसे बेबाक संतों की बात आई, तो उन्हें यह कहकर किनारे करने की कोशिश हुई कि ये तो कड़वी बात बोलते हैं, इनकी बोली अटपटी है, या इनकी कविता में वह 'साहित्यिक सौंदर्य' नहीं है। यह असल में एक खास तरह की सगुण और अभिजात दृष्टि को पूरे साहित्य पर थोप देने जैसा है। जिस चेतना को 'विकृत', 'रुक्ष' या 'भटकाव' कहकर खारिज किया गया, वह कोई मामूली बात नहीं थी; वह तो सदियों से चले आ रहे जात-पात, कुलाचार और शास्त्रों की गुलामी के खिलाफ समाज के सबसे निचले तबके का एक कड़ा और संगठित लोक-प्रतिरोध था।

भारतीय समाज को अगर किसी एक चीज़ ने सबसे गहराई तक तोड़ा और पंगु बनाया है, तो वह जाति और वर्ण का ढाँचा है। उत्तर-वैदिक दौर से ही जिस तरह दासों, कारीगरों, भूमिहीन श्रमिकों और अतिशूद्रों की पीठ पर दमन का चक्र चला, उसका खूनी हिसाब इतिहास में दर्ज है। पर कोई भी सत्ता सिर्फ लाठी या हिंसा के दम पर तो सदियों तक राज कर नहीं सकती। दमन को टिकाऊ और सर्वस्वीकार्य बनाने के लिए धर्म और दर्शन का एक ऐसा अभेद्य ताना-बाना बुना गया जो सीधे इंसान की सोचने-समझने की क्षमता पर वार करे। कर्म, पुनर्जन्म और परलोक का डर कुछ इस तरह फैलाया गया कि गरीब और शोषित आदमी अपने ऊपर हो रहे रोज़मर्रा के ज़ुल्म को ईश्वर की मर्ज़ी और अपने पुराने जन्मों का पाप मानने लगा। उससे कहा गया कि इस जन्म की जिल्लत और बेगारी को खामोशी से सह लो, तभी अगले जन्म में मुक्ति या बेहतर जीवन मिलेगा। इस तरह, बगावत का जो भी स्वाभाविक स्वर उठ सकता था, उसे अध्यात्म की चादर में लपेटकर दार्शनिक स्तर पर ही ठंडा कर दिया गया।

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि यह दमन बिना किसी रुकावट के निष्कंटक चलता रहा। इसके खिलाफ समय-समय पर तीखी आवाजें उठती रहीं। लोकायत (चार्वाक), बौद्ध और जैन विचारकों ने वेदों की अटलता, परलोक की कल्पना और यज्ञ के नाम पर होने वाले पाखंड को खुली चुनौती दी। लोकायत दर्शन ने सीधे कहा कि जो आँख से दिखाई नहीं देता—जैसे स्वर्ग, नरक या आत्मा—वह केवल ढोंग है, और यज्ञीय कर्मकांड केवल पुरोहितों की आजीविका चलाने के प्रपंच हैं। इसी तरह बुद्ध का पूरा चिंतन ईश्वर या शास्त्रों की गोलमोल बातों में उलझने के बजाय इंसान के प्रत्यक्ष दुःखों और उसके व्यावहारिक हल पर टिका था। जब बुद्ध ने 'अप्प दीपो भव' (अपना प्रकाश स्वयं बनो) का सूत्र दिया, तो पुरोहितों की दलाली और मध्यस्थता अपने आप टूटने लगी। ठीक इसी तरह, दक्षिण के पुराने संगम साहित्य को देखें तो वहाँ किसी के आगे हाथ जोड़ने, भयभीत होने या दास बनने का भाव नहीं मिलता; वहाँ जीवन का उल्लास था, प्रकृति से जुड़ाव था, इंसानी रिश्ते थे और बराबरी की ज़मीन पर टिका प्रेम था।

जब इस लोक-चेतना का दायरा बढ़ने लगा और स्थापित सत्ता को लगा कि उसकी ज़मीन खिसक रही है, तो वैदिक और पौराणिक परंपरा ने खुद को नए रूप में पुनर्गठित करना शुरू किया। भगवद्गीता के ज़रिए वर्ण-व्यवस्था को 'गुण और स्वभाव' का मुलम्मा चढ़ाकर फिर से सही ठहराया गया। बाद के पुराणों ने दक्षिण के भावुक भक्ति-गीतों को अपने कब्ज़े में लिया और उन्हें कथा-कहानियों व अवतारवाद के जाले में ढाल दिया। इस पूरी चालाकी से निम्न जातियों और औरतों को भक्ति करने की छूट तो मिली, पर शर्त यह रख दी गई कि वे अपनी परतंत्रता, हीनता और सेवा-भाव को भगवान का हुक्म मानकर सहर्ष स्वीकार करें। सामंत और सेवक के शोषणकारी रिश्ते को ही भक्ति में 'दास्य भाव' का पवित्र नाम देकर पूज्य बना दिया गया।

यहाँ मंदिर-संस्कृति, सामंती अर्थव्यवस्था और राज्य-सत्ता के गठजोड़ को गहराई से समझना बहुत ज़रूरी है। दक्षिण (पल्लव, चोल दौर) से लेकर उत्तर भारत तक बड़े-बड़े मंदिरों का निर्माण केवल आध्यात्मिक शांति के लिए नहीं हुआ, बल्कि वे अकूत ज़मीन, अकूत संपत्ति और सामंती नियंत्रण के बड़े आर्थिक केंद्र बने। 'ब्रह्मदेय' (ब्राह्मणों और मंदिरों को दी जाने वाली कर-मुक्त भूमि) के ज़रिए ज़मींदारी व्यवस्था को मजबूत किया गया। किसान और मज़दूर ज़मीन से बँधे 'भूमि-दास' बनते चले गए। इस आर्थिक और सामाजिक गुलामी को आध्यात्मिक वैधता देने के लिए मंदिर के देवता को 'महाराजाधिराज' या 'चक्रवर्ती राजा' के रूप में गढ़ा गया। जिस तरह दरबारी व्यवस्था में राजा के आगे प्रजा दंडवत होती थी, ठीक उसी तरह मंदिर के गर्भगृह में देवता के सामने आम आदमी को 'दास' या 'चाकर' बनाकर खड़ा कर दिया गया। राज्य-सत्ता की हिंसा, कर-संग्रह और दमन को धर्म की आड़ देकर सही ठहराया गया ताकि प्रजा कभी राजा या व्यवस्था के खिलाफ आँख न उठा सके।

फिर आठवीं सदी में अद्वैत वेदांत का जो दर्शन सामने आया, उसने "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या" का ढोल पीटकर इस जीती-जागती दुनिया, इंसान के सामाजिक सरोकारों और उसकी हाड़-तोड़ मेहनत को 'माया' या छलावा बता दिया। इसका भयानक नतीजा यह निकला कि जो सामाजिक दमन और विषमता आँखों के सामने घट रही थी, उसे एक दार्शनिक भ्रम घोषित कर दिया गया और शास्त्रों के किसी भी विधान पर तर्क करने के रास्ते ही बंद कर दिए गए।

इस पूरे घमासान में भाषा का सवाल भी बेहद केंद्रीय था। संस्कृत को 'देवभाषा' बनाकर ज्ञान, दर्शन और धर्म-ग्रंथों पर एक खास वर्ग का एकाधिकार जमा दिया गया था। आम जनता के लिए उस भाषा के दरवाज़े पूरी तरह बंद थे। लेकिन जब बौद्धों की पालि-प्राकृत से होते हुए कबीर, रैदास और नानक की सधुक्कड़ी व लोकभाषाएँ मैदान में आईं, तो यह केवल भाषा का बदलाव नहीं था। यह संस्कृत के भाषिक वर्चस्व और एकाधिकार पर लोक का सीधा हमला था। लोकभाषा में लिखकर इन संतों ने ज्ञान को संस्कृत के बंद कमरों से निकालकर चौराहों, खेतों और बस्तियों तक पहुँचा दिया। उन्होंने 'शास्त्र' की अभिजात संस्कृति के मुकाबले 'लोक' की मौखिक परंपरा, लोक-गीतों (साखी, सबद, रमैनी, उलटबाँसी, पद) और आम बोलचाल के बिंबों को अपना हथियार बनाया।

यहीं पर सगुण परंपरा और निर्गुण संतों की राहें पूरी तरह जुदा हो जाती हैं। एक तरफ जहाँ व्यवस्था का समर्थन करने वाली धारा अपने ईश्वर को जनेऊ, मुकुट, भारी-भरकम हथियारों, कुलाचार और राजघराने से सजाकर पेश करती है, वहीं कबीर, रैदास, नानक और तुकाराम जैसे संत ईश्वर को किसी भी बाहरी दिखावे, जनेऊ, अस्त्र-शस्त्र या राजसी घराने से पूरी तरह आज़ाद कर देते हैं। कबीर का राम किसी अयोध्या के राजा का बेटा नहीं है; वह तो आम इंसान के भीतर बसी उस चेतना का नाम है जो हर तरह के भेद-भाव को नकारती है।

इस संदर्भ में 'श्रम की प्रतिष्ठा' का सवाल सबसे अहम है। अद्वैत और सगुण ज्ञानकांड ने हाथ से काम करने वाले को हमेशा हीन माना और दिमाग से शास्त्र पढ़ने वाले को श्रेष्ठ। लेकिन कबीर जुलाहा रहे, रैदास जूता गाँठते रहे, सेना नाई थे, पीपा दर्ज़ी थे। इन संतों ने भक्ति करने के लिए अपने काम-धंधे या गृहस्थी को नहीं छोड़ा। उन्होंने चमड़ा छीलने, कपड़ा बुनने और खेती करने के काम को ही साधना बना दिया। उन्होंने 'हाथ' को 'मस्तिष्क' के शोषक एकाधिकार के खिलाफ खड़ा किया और पसीने की कमाई को पूजा से बड़ा दर्जा दिया। अछूत समझे जाने वाले संतों—जैसे संत रविदास और महाराष्ट्र के वारकरी संत चोखामेला—ने मंदिर-प्रवेश के निषेध और शारीरिक अपवित्रता की घृणित अवधारणा पर सीधे तीखे सवाल खड़े किए।

इसी तरह अगर स्त्री-प्रश्नों को देखें, तो सगुण आख्यानों में स्त्री को हमेशा मर्यादा, पतिव्रत और वर्णाश्रम के कठोर दायरे के भीतर एक आश्रित के रूप में रखा गया। इसके विपरीत मीराबाई, लल्लेश्वरी या अक्क महादेवी जैसी स्त्रियों ने सीधे-सीधे राजसी ठाट-बाट, पितृसत्तात्मक मर्यादाओं और पारिवारिक बंदिशों को ठेंगा दिखा दिया। मीरा का 'राणा जी म्हाने या लोक-लाज ना भावे' कहना असल में सामंती और पितृसत्तात्मक ढांचे पर करारा तमाचा था।

यह दमन-विरोधी चेतना केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह एक अखिल भारतीय लोक-उभार था। महाराष्ट्र में वारकरी संतों (ज्ञानदेव, नामदेव, तुकाराम, चोखामेला), कर्नाटक में बसवेश्वर के 'वचन साहित्य', असम में शंकरदेव और बंगाल में चंडीदास की परंपरा में जात-पात और शास्त्रीय पाखंड का इसी तरह तीखा विरोध हुआ।

आगे चलकर जब औपनिवेशिक इतिहासकारों (जैसे ग्रियर्सन आदि) ने इस दौर को लिखा, तो उन्होंने अपनी 'फूट डालो और राज करो' की नीति के तहत इसे 'ईसाइयत की देन' या केवल 'मुस्लिम आक्रमण से उपजी निराशा' बताकर इसके हज़ारों साल पुराने आंतरिक सामाजिक-आर्थिक संघर्ष पर धूल डाल दी। अफसोस कि बाद की तथाकथित 'प्रगतिशील' आलोचना भी इस औपनिवेशिक और सगुण-केंद्रित जाल से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाई। उसने भी कबीर और तुलसी को जबरन एक ही 'समन्वयवादी' पलड़े में तौलने की कोशिश की, जिससे निर्गुण धारा का मूल क्रांतिकारी और विद्रोही चरित्र धुंधला पड़ गया।

कबीर, रैदास, तुकाराम या मीरा कोई अचानक पैदा हुए चमत्कार नहीं थे और न ही वे किसी बाहरी प्रभाव की देन थे। वे वास्तव में सिद्धों, नाथों, बौद्धों, लोकायत और उस पुरानी अनवरत लोक-धारा का हिस्सा थे जो सदियों से गैर-बराबरी, पाखंड और दमन के खिलाफ लड़ती आ रही थी।

इसलिए भक्तिकाल को सिर्फ एक बने-बनाये 'छद्म समन्वय' या 'शांत भक्ति' की आँख से देखना इतिहास के साथ भारी बेईमानी होगी। आज जब पुरानी वर्चस्ववादी सोच नए-नए पैंतरों के साथ हमारे सामने आ रही है, तब इस पूरे दौर को नए सिरे से समझना और टटोलना बेहद ज़रूरी हो गया है। हमें भक्ति के उस असली, बेबाक और जुझारू रूप को पहचानना होगा जो सदियों के दमन के बाद भी आज हमें समता, तर्क, श्रम के सम्मान और अपने मानवीय हक की लड़ाई लड़ने का हौसला देता है।

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