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तुम्हारा शेष रहना

 

तुम्हारा शेष रहना

“जब तुम मेरे पास से चली जाती हो, तो तुम्हारा जाना पूरी तरह जाना नहीं होता। तुम्हारी भौतिक अनुपस्थिति के बाद भी मेरे एकांत में जो तुम्हारा स्पर्श, तुम्हारी गूँज और तुम्हारा अहसास ठहरा रह जाता है, वही मेरे जीने का आधार है। यह कोई खालीपन नहीं, बल्कि मेरे भीतर तुम्हारा एक सूक्ष्म रूप में सदा के लिए बस जाना है।”

मानव जीवन और प्रेम की सबसे सुंदर विडंबना यही है कि यहाँ कुछ भी पूरी तरह समाप्त नहीं होता। संसार जिसे 'शून्यता' या 'अभाव' कहता है, दरअसल वह एक नए किस्म का 'होना' होता है। जब तुम मुझसे दूर जाती हो, तो वह प्रस्थान पूरी तरह से विदा होना नहीं होता। यह जाना, वास्तव में जाना नहीं, बल्कि मेरे भीतर और गहरे उतर जाना है। संसार केवल उसी को सच मानता है जिसे आँखों से देखा जा सके, लेकिन हमारा प्रेम तो दृश्य से अदृश्य की यात्रा है। तुम्हारी अनुपस्थिति में मेरा अंतस और सक्रिय हो जाता है; जो स्पर्श कभी त्वचा पर था, वह अब आत्मा पर अंकित हो जाता है, और जो गूँज कानों में थी, वह मेरे विचारों की धड़कन बन जाती है।

अक्सर लोग विरह को एक खालीपन या दुख की तरह देखते हैं, जहाँ जीवन ठहर जाता है। किंतु मेरे लिए यह कोई खालीपन नहीं, बल्कि मेरे भीतर तुम्हारा एक बेहद सूक्ष्म रूप में सदा के लिए प्रतिष्ठित हो जाना है। जैसे पानी जब फ़र्श से सूखता है, तो वह फ़र्श को सुखाकर दरिद्र नहीं बनाता, बल्कि उसे शीतलता का एक अमूर्त उपहार दे जाता है। सूरज जब डूबता है, तो हवा में अपनी साँसों की तपिश छोड़ जाता है। ठीक उसी तरह, तुम्हारा जाना मेरे हृदय को रिक्त नहीं करता, बल्कि उसे स्मृतियों के वैभव से भर देता है। यह कोई शून्यता नहीं, बल्कि एक मौन पूर्णता है, जहाँ तुम बाहर से सिमटकर पूरी तरह मेरे भीतर समाहित हो जाती हो।

यही अहसास आज मेरे जीने का आधार है। हम इंसान केवल वर्तमान में नहीं जीते, हम उन अनुभूतियों के सहारे जीते हैं जो समय की सीमा को लांघ चुकी हैं। जब तुम सामने नहीं होतीं, तब मेरे भीतर बची हुई तुम्हारी यह अनुगूंज ही मुझे जीने की ऊर्जा देती है। तुम्हारे जाने के बाद भी मेरे अंतर्मन में जो यह संवाद चलता रहता है, वही मुझे उदासी से बचाता है और एक आत्मिक उल्लास से भर देता है।

इसलिए, मेरा यह अहसास महज़ एक विरह का रोना नहीं है, यह तो हमारे प्रेम की जीत का घोषणापत्र है। यह बताता है कि दूरी केवल भूगोल की होती है, भावनाओं की नहीं। जो आँखों से ओझल हुआ, वह नष्ट नहीं हुआ। फ़र्श पर बची हुई यह शीतलता, हवा में ठहरी हुई यह तपिश, और मेरे भीतर चलता हुआ यह संवाद—शोक की राख नहीं है, बल्कि उस शाश्वत प्रेम का उत्सव है जो समय और दूरी की सीमाओं से बहुत ऊपर, हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो चुका है। यह तुम्हारी अनुपस्थिति में भी तुम्हारी जीवंत उपस्थिति का एक अनंत उत्सव है।

✍️ अमरेश सिंह भदौरिया




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