प्रेम का प्रथम स्पंदन●●●●●
●●The First Throb of Love
अमरेश सिंह भदौरिया
प्रेम मनुष्य के जीवन का सबसे कोमल, सबसे मधुर और सबसे गहन अनुभव है। यह ऐसा भाव है, जो न उम्र देखता है, न परिस्थिति; यह अनायास, अकारण और अकस्मात हृदय के किसी कोने में जन्म लेता है। प्रेम का पहला स्पर्श, पहला अहसास, मन के भीतर एक अदृश्य हलचल पैदा करता है—मानो किसी ने जीवन के सूखेपन में पहली बार भीनी-भीनी बारिश की बूँदें बिखेर दी हों। जब किसी के प्रति आकर्षण का यह बीज पहली बार अंकुरित होता है, तो मन अनजानी-सी उमंग से भर उठता है। सामान्य दृश्य भी अद्भुत लगने लगते हैं—हवा का झोंका, पत्तियों की सरसराहट, चाँदनी की चाँदी, सब कुछ नया और मनोहर प्रतीत होता है। हृदय में एक अनकहा संवाद चलता है, जिसे शब्दों में बाँध पाना कठिन होता है। कभी मुस्कान अपने आप फैल जाती है, कभी किसी की स्मृति में आँखें खो जाती हैं। प्रेम का पहला स्पंदन मनुष्य को संवेदनशील और उदार बना देता है। व्यक्ति के व्यवहार में कोमलता आ जाती है, दृष्टि में मधुरता और विचारों में विस्तार। वह सामने वाले की खुशी में अपनी खुशी खोजने लगता है। यह भाव आत्मकेंद्रित जीवन को परार्थक बना देता है। हालाँकि, यह भी सत्य है कि प्रेम का यह आरंभिक स्पंदन कभी-कभी मन को उलझन और संकोच से भर देता है। अनिश्चितता, संदेह और प्रतीक्षा के क्षण भी इसी के साथ जुड़ते हैं। लेकिन इन उतार-चढ़ावों में ही जीवन के सबसे सुंदर अनुभव छिपे होते हैं।
अंततः, प्रेम का पहला स्पंदन व्यक्ति के जीवन में एक नई दृष्टि देता है। यह हमें सिखाता है कि सच्ची खुशी केवल पाना नहीं, बल्कि किसी के लिए निःस्वार्थ भाव से जीना है। यह पहला अनुभव चाहे पूर्ण हो या अपूर्ण, स्मृतियों में हमेशा एक उजली, सुगंधित पंखुड़ी बनकर सहेजा जाता है।
इस बात (प्रेम) को एक उदाहरण द्वारा और बेहतर ढंग से समझा जा सकता है—
जब हम किसी शांत सरोवर में एक कंकड़ फेंकते हैं, तो परिणामस्वरूप स्थिर और शांत जल में स्पंदन होता है। स्पंदन से उत्पन्न हुई लहरें शोर करने लगती हैं, और यह शोर लहरों की प्रकृति है। यह शोर दूर किनारों पर जाकर टकराता है, कुछ क्षण पश्चात कम हो जाता है और समाप्त हो जाता है। ऐसा क्यों? क्योंकि किनारे अविचल हैं, स्थिर हैं, समाधिस्थ हैं। अब आप विचार करें—पहले और बाद की स्थिति में जो परिवर्तन हुआ, उसे ही प्रेम की प्रथम अनुभूति कहा जाता है। यही प्रेम की पहली अनुभूति संवेदनशील हृदय को स्पंदित करती है, ठीक उसी सरोवर की तरह। यही क्षण परमानंद की अनुभूति का होता है। आनंद ऊर्जा का अक्षय स्रोत है, और जिसके हृदय में आनंद की जितनी बड़ी अनुभूति है, वह उतनी बड़ी ऊर्जा का अधिपति है। हृदय में जब भावनाओं का ज्वार उमड़ता है, तो हृदय की वही स्थिति होती है जो सरोवर के शांत और स्थिर जल को कंकड़ी के प्रथम स्पर्श से होती है। जल में तरंगें उठती हैं, तरंगों का समूह लहरों को जन्म देता है। लहरें आन्दोलित होती हैं और वेगवती होकर किनारों से टकराती हैं। कुछ यही स्थिति प्रेम में होती है, जब अहसासों का ज्वार उमड़ता है—इसे ही प्रेम का प्रथम स्पंदन (The First Throb of Love) कहा जाता है। अभी सब कुछ ऊपरी सतह पर ही हो रहा है, गहराई से इसका कोई सरोकार नहीं—न हृदय की, न ही सरोवर की।
विचारणीय प्रश्न यह है कि जब कंकड़ ने सरोवर की सतह को स्पर्श किया, तो जो अनुभूति सरोवर को हुई, क्या वह कंकड़ के पास थी? जैसे—स्पंदन, लहरें, उन्माद, किनारों को दरेरने की उद्विग्नता आदि। अगर कहें कि “हाँ”, तो एक तर्क उठता है—क्या कंकड़ ये सब पहाड़ में भी उत्पन्न कर सकता है? क्या यह रेगिस्तान में भी संभव है? उत्तर स्पष्ट है—नहीं। कारण यह है कि पहाड़ का हृदय कठोर है, अतः वहाँ स्पंदन संभव नहीं है। रही बात दूसरे विकल्प रेगिस्तान की, तो वह हृदयहीन है। प्रेम की उत्पत्ति केवल सरस हृदय में ही संभव है, जहाँ संवेदना है। इन दोनों तथ्यों से स्वतः सिद्ध हो जाता है कि यह सब कंकड़ के पास नहीं था। फिर प्रश्न उठता है—यह सब आया कहाँ से? तो तर्क यही ठहरता है कि यह सब सरोवर के पास पहले से ही था। अब प्रश्न यह है कि जब यह सब सरोवर के पास पहले से ही था, तो इसका प्रभाव पहले क्यों नहीं दिखाई पड़ा? उत्तर यह है कि यह सब सरोवर के हृदय में प्रसुप्त अवस्था में था। तो फिर कंकड़ ने क्या किया? जी हाँ—कंकड़ ने केवल प्रसुप्त अवस्था को जाग्रत करने का कार्य किया। क्या इसे ही प्रेम कहते हैं? जी नहीं। फिर प्रश्न उठता है—यह क्या है? इसे किस नाम से पुकारा जाए? तो उत्तर यह है—यह प्रेम की मंज़िल का पहला उपक्रम है, पहला पायदान है। अभी प्रेम के बीज ने अहसास की ज़मीन को छुआ भर है। जिस प्रकार किसी बीज में वृक्ष की पूरी परिकल्पना छुपी होती है—अंकुरण, जड़, तना, नवीन कोंपल, पुष्प और फिर बीज—जो अभी संभाव्य है, वर्तमान नहीं।
बीज को अंकुरित होने के लिए नमी, उष्णता और आवश्यक उर्वरता से युक्त ज़मीन का होना आवश्यक है, साथ ही बीज में अनुकूल अंकुरण की सामर्थ्य भी होनी चाहिए। इतने के बाद भी बीज में आत्मबलिदान का स्वयंस्फूर्त साहस होना ज़रूरी है। इसके अभाव में तो वृक्ष की पूरी परिकल्पना ही व्यर्थ हो जाती है। कुछ यही स्थिति हृदय में प्रेमरूपी बीज के अंकुरण की होती है।
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