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स्वयं की खोज

 

स्वयं की खोज

✍️ अमरेश सिंह भदौरिया

आज की इस बेतहाशा भागती दुनिया में हम सब एक अजीब से विरोधाभास के बीच जी रहे हैं। हमारे पास बात करने के लिए स्क्रीन पर हज़ारों डिजिटल दोस्त मौजूद हैं, लेकिन जब मन भारी हो, तो अपनी बात खुलकर कहने के लिए कोई एक कंधा नहीं मिलता। दुनिया भर की जानकारी हमारी उंगलियों पर है, लेकिन अगर कोई हमसे यह पूछ ले कि इस वक़्त हमारे भीतर क्या चल रहा है, तो हम बगलें झांकने लगते हैं। हम रोज़ सुबह उठते हैं, समाज द्वारा तय किए गए पैमानों पर खरा उतरने की दौड़ में शामिल होते हैं, अपनी पेशेवर ज़िम्मेदारियों को निभाते हैं और रात को थककर सो जाते हैं। इस पूरे चक्रव्यूह में एक बहुत ही मासूम सी, लेकिन बेहद भारी चूक हमसे हो जाती है—हम सब कुछ पा लेते हैं, बस खुद को ही कहीं पीछे छोड़ देते हैं।

कभी किसी शांत शाम को खिड़की के पास बैठकर खुद से एक सीधा सवाल पूछिए। हम दिनभर में न जाने कितने लोगों से मिलते हैं, उनकी पसंद-नापसंद का ख्याल रखते हैं, उनके मिज़ाज को समझने की कोशिश करते हैं, पर क्या कभी हमने खुद के साथ भी पाँच मिनट की कोई आत्मीय मुलाकात की है? सच तो यह है कि जब हम 'स्वयं की खोज' जैसे शब्द सुनते हैं, तो हमारे दिमाग में हिमालय की कंदराएं, संसार का त्याग या कोई कठिन आध्यात्मिक साधना आने लगती है। लेकिन मेरा मानना है कि यह कोई रहस्यमयी या डरावनी यात्रा नहीं है। यह तो एक बहुत ही सरल, सहज और रोज़मर्रा के जीवन से जुड़ी हुई प्रक्रिया है—अपने ही भीतर झांकने, अपने विचारों से दोस्ती करने और खुद को उसके मूल रूप में स्वीकार करने की।

यदि हम जीवन को थोड़ा गहराई से देखें, तो हमारा अस्तित्व परतों में लिपटा हुआ दिखाई देता है। जन्म लेते ही हमें एक नाम दे दिया जाता है, फिर एक धर्म, एक जाति, एक राष्ट्रीयता की मुहर लग जाती है। जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, हमारे साथ हमारी डिग्रियां, हमारा पद, हमारा बैंक बैलेंस और हमारे रिश्तों के नाम जुड़ते चले जाते हैं। ये सभी बाहरी आवरण हैं, जिन्हें समाज ने व्यवस्था चलाने के लिए बनाया है। लेकिन दिक्कत तब शुरू होती है जब हम इन बाहरी मुखौटों को ही अपनी अंतिम और एकमात्र सच्चाई मान बैठते हैं। हम सोचने लगते हैं कि यदि मेरा यह पद चला गया, या मेरी यह सामाजिक छवि खराब हो गई, तो मेरा अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई अभिनेता रंगमंच पर राजा का किरदार निभाते-निभाते यह भूल जाए कि नाटक खत्म होने के बाद वह एक सामान्य इंसान है। जब राजा का मुकुट उतरता है, तो वह भीतर से घबरा जाता है। खुद को जानने की शुरुआत ठीक इसी बिंदु से होती है, जहाँ हम इन सभी बाहरी उपाधियों, मुखौटों और सामाजिक अपेक्षाओं को थोड़ी देर के लिए एक तरफ रखकर अपने असली, निश्छल रूप को देखने का साहस जुटाते हैं। यह जानना बेहद ज़रूरी है कि हम केवल वो नहीं हैं जो दुनिया हमारे बारे में सोचती है, बल्कि हम उससे कहीं अधिक गहरे और सच्चे हैं।

इस गहरे दर्शन को अपने रोज़मर्रा के जीवन में उतारना उतना ही सहज है जितना कि सांस लेना। इसके लिए हमें अपनी नौकरी छोड़ने की या किसी विशेष प्रकार के वस्त्र पहनने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि अपनी दैनिक आदतों और सोचने के तरीके में एक सूक्ष्म सा बदलाव लाने की ज़रूरत है। इस व्यावहारिक मार्ग का सबसे पहला और बुनियादी कदम है—आत्म-अवलोकन, यानी खुद को एक तीसरे व्यक्ति की तरह देखना। जब हमें किसी बात पर तेज़ गुस्सा आता है, या जब हम किसी अनजाने डर से घिर जाते हैं, तो आमतौर पर हम उस भावना में पूरी तरह बह जाते हैं और वैसे ही प्रतिक्रिया दे देते हैं। दार्शनिक समझ कहती है कि उस समय थोड़े से पीछे हट जाइए। खुद को एक साक्षी या एक दर्शक की तरह देखिए और मन ही मन कहिए, "अच्छा, इस समय मेरे भीतर गुस्सा आ रहा है।" जैसे ही आप खुद को अपने विचारों और भावनाओं से अलग करके देखना शुरू करते हैं, वैसे ही उनका आपके ऊपर से नियंत्रण कम होने लगता है। आप यह समझने लगते हैं कि आप वह गुस्सा या वह डर नहीं हैं, बल्कि आप वह चेतना हैं जो इन सब तरंगों को उठते और गिरते हुए देख रही है। यह छोटा सा अभ्यास आपको मानसिक गुलामी से आज़ाद कर देता है।

इसी यात्रा का दूसरा और बेहद प्रभावशाली तरीका है—मौन का आलिंगन करना। आज के आधुनिक युग में अगर किसी चीज़ का सबसे भयंकर अकाल है, तो वह है 'मौन'। सुबह आँख खुलने से लेकर रात को सोने तक हमारा दिमाग लगातार सूचनाओं को सोख रहा है। कभी सोशल मीडिया की रील्स, कभी समाचार, कभी दफ्तर की गपशप तो कभी काम का तनाव। जब तक बाहर का यह कोलाहल थमेगा नहीं, तब तक आपके भीतर की वह बेहद बारीक, कोमल और सच्ची आवाज़, जिसे हम अंतःप्रेरणा या विवेक कहते हैं, आपको कभी सुनाई नहीं देगी। इसके लिए किसी लंबे ध्यान सत्र की आवश्यकता नहीं है। रोज़ सुबह या रात को सोने से पहले सिर्फ दस से पंद्रह मिनट के लिए बिना किसी मोबाइल, बिना किसी किताब और बिना किसी काम के, शांत बैठिए। शुरुआत में दिमाग में विचारों का एक तूफ़ान उठेगा, पुरानी बातें याद आएंगी, भविष्य की चिंताएं सताएंगी। लेकिन जैसे ही आप उन विचारों से बिना लड़े, उन्हें केवल गुज़रते हुए देखते रहेंगे, धीरे-धीरे वह धूल छंटने लगेगी। पानी जब शांत होता है, तभी उसकी तली में छिपा हुआ मोती दिखाई देता है। ठीक उसी तरह, जब मन का शोर थोड़ा थमता है, तब आपको अपनी वास्तविक इच्छाओं, अपनी वास्तविक प्राथमिकताओं का अहसास होने लगता है।

इन सबमें जो सबसे बड़ी और सबसे कठिन चुनौती आती है, वह है पूर्ण स्वीकार्यता। स्वयं की खोज का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि हम केवल अपनी अच्छाइयों, अपनी प्रतिभाओं और अपनी जीतों को ही गिनते रहें और उनका जश्न मनाएं। वास्तविक खोज तो तब सफल होती है जब हम अपनी कमियों, अपनी कमज़ोरियों, अपने पुराने घावों और अपने भीतर छिपे ईर्ष्या या डर जैसे विकारों को भी पूरी सहजता से स्वीकार कर लेते हैं। हम अक्सर अपनी कमियों को छुपाने की कोशिश करते हैं, खुद से भी और दुनिया से भी। लेकिन मनोविज्ञान और दर्शन दोनों ही कहते हैं कि जिस चीज़ को हम नकारते हैं, वह हमारे भीतर और गहरी होती चली जाती है। जब आप आईने के सामने खड़े होकर पूरी ईमानदारी से कह पाते हैं कि "हाँ, मुझमें यह कमी है, मैं कभी-कभी कमज़ोर पड़ जाता हूँ, और यह पूरी तरह से सामान्य है," तब आपके भीतर का एक बहुत बड़ा बोझ हल्का हो जाता है। खुद से प्रेम करना और खुद को जैसा है वैसा ही स्वीकार करना, आंतरिक रूपांतरण की पहली सीढ़ी है।

जब आप इस प्रकार खुद को धीरे-धीरे समझने लगते हैं, तो आपके बाहरी जीवन में भी एक जादुई बदलाव आने लगता है। सबसे पहली चीज़ जो बदलती है, वह है आपका दूसरों पर निर्भर रहना। जब आप अपनी आंतरिक संपदा से परिचित हो जाते हैं, तो आपको अपनी खुशी, अपने सही होने या अपने फैसलों के लिए दुनिया की मंज़ूरी की, उनकी तारीफों की बैसाखी नहीं चाहिए होती। आप किसी के द्वारा की गई आलोचना से टूटते नहीं हैं और न ही किसी की झूठी प्रशंसा से अहंकार में फूलते हैं। आप परिस्थितियों के हाथों की कठपुतली बनने के बजाय अपने जीवन की पतवार खुद संभाल लेते हैं। आपके भीतर एक ऐसा ठहराव आता है जो बाहरी आंधियों से विचलित नहीं होता। जीवन में सुख आए या दुख, सफ़लता मिले या असफ़लता, आप दोनों ही स्थितियों में अपना मानसिक संतुलन बनाए रखने की कला सीख जाते हैं। रिश्तों में भी एक अद्भुत परिपक्वता आ जाती है, क्योंकि जब आप खुद को समझ लेते हैं, तो आप दूसरों को भी उनके असली रूप में स्वीकार करने लगते हैं, बिना उन्हें बदलने की ज़िद किए।

हमें यह बात बहुत गहराई से समझनी होगी कि खुद को खोजना कोई एक दिन का चमत्कार नहीं है और न ही यह कोई ऐसी अंतिम मंज़िल है जहाँ पहुँचकर यात्रा समाप्त हो जाए। यह तो हर दिन, हर पल, सजगता से जीने का एक बेहद खूबसूरत तरीका है। यह हर सुबह उठकर खुद से एक नया परिचय करने का नाम है। हमारा संपूर्ण दर्शन इसी एक सत्य की ओर इशारा करता है कि जिस शांति, जिस आनंद और जिस असीम तृप्ति को हम पूरी दुनिया के पदार्थों में, पद-प्रतिष्ठा में और इंसानों में तलाश रहे हैं, वह महज़ एक मृगतृष्णा की तरह है। वह परम सत्य कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे अपने ही भीतर पूरी महिमा के साथ निवास करता है। वह बस हमारे लौट आने का इंतज़ार कर रहा है। आवश्यकता केवल इतनी सी है कि हम बाहर की इस अंतहीन, अंधी दौड़ को थोड़ा धीमा करें, अपने बिखरे हुए विचारों को समेटें और एक छोटा सा, सच्चा और ईमानदार कदम अपने अंतर्मन की ओर बढ़ाएं। यही वह यात्रा है जो हमें इंसान से एक प्रबुद्ध चेतना की ओर ले जाती है और जीवन को सार्थक बनाती है।




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