शिवनारायण की डायरी से
(दिनांक : अनिश्चित, पर अनुभव बहुत निश्चित)
आज सुबह कुछ पुरानी कापियाँ पलटते हुए एक पुराना सवाल फिर से ज़हन में कौंध गया—क्या जानकारी ही ज्ञान है?
कभी लगता था, हाँ, दोनों एक ही सिक्के के दो नाम हैं। लेकिन जीवन ने बार-बार यह भ्रम तोड़ा है। अब जब पीछे देखता हूँ, तो साफ़ समझ आता है कि जानकारी और ज्ञान में वही अंतर है, जो पानी की सतह और उसकी गहराई में होता है।
कक्षा में पढ़ाते हुए मैंने हज़ारों बच्चों को तरह-तरह की जानकारियाँ दीं। साल, तिथियाँ, परिभाषाएँ, सूत्र... सब कुछ। लेकिन जब वही बच्चे जीवन की कठिन परिस्थितियों में उलझे, तो कई बार पाया कि उनके पास जानकारी तो थी, पर निर्णय लेने का ज्ञान नहीं।
जानकारी वह है जो हम पढ़ते हैं, सुनते हैं, दूसरों से सीखते हैं—एकत्र करते हैं। जैसे कोई कहे—"जल 100 डिग्री सेल्सियस पर उबलता है"—यह एक जानकारी है।
पर ज्ञान? वह तब आता है जब हम सोचते हैं—इस उबाल का जीवन में क्या अर्थ है?
मेरे जीवन का अनुभव यही कहता है कि जानकारी बाहर से आती है, लेकिन ज्ञान भीतर से उपजता है। जानकारी को कोई भी दे सकता है—गूगल, किताब, मोबाइल... लेकिन ज्ञान अर्जित करना पड़ता है, जैसे कोई किसान बीज बोकर महीनों तक उसे सींचता है।
एक बार गाँव के ही एक लड़के ने मुझसे कहा—"गुरुजी, इंटरनेट पर सबकुछ मिल जाता है, अब स्कूल आने की क्या ज़रूरत?"
मैं मुस्कराया, लेकिन भीतर एक हूक उठी। क्या वह समझ पाएगा कि ज्ञान कोई डाउनलोड करने की चीज़ नहीं, बल्कि धैर्य, अनुभव और आत्म-संवाद की उपज है?
आज जब हम सूचना के महासागर में डूबे हुए हैं, तब मुझे यह डर सताता है कि कहीं हम ज्ञान की प्यास ही न भूल जाएँ। जानकारी हमें दिशा का संकेत दे सकती है, पर रास्ता तो ज्ञान ही दिखाता है।
मैं अपने विद्यार्थियों से हमेशा कहता हूँ—
"सूचना को समझो, उस पर सोचो, उसे जियो – तभी वह ज्ञान बनेगी। वरना वह रटी हुई पंक्तियाँ रह जाएँगी, जिनका जीवन से कोई लेना-देना नहीं होता।"
– शिवनारायण
(एक शिक्षक, जो अब भी सीख रहा है…)
अमरेश सिंह भदौरिया
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