शीतली छाँव
पीपल की जड़ों में
बैठा है एक दिन—
थका हुआ, धूप से जर्जर,
पर साँसों में
अब भी उम्मीद लिए।
छाँव गिरती है धीरे-धीरे,
जैसे माँ की हथेली
बुखार से तपते माथे पर—
ना शोर, ना दावा—
बस शीतलता का संकल्प।
साथ की पगडंडी से
गुज़रते हैं चरवाहे,
सर पर घास का गठ्ठर लिए
स्त्रियाँ लौटती हैं खेतों से,
और छाँव सबको
बराबरी से पुकारती है।
यही तो जीवन है—
जहाँ थकावट के बीच
एक वृक्ष
अपनी मौन करुणा से
पूरी दुनिया को सहलाता है।
©®अमरेश सिंह भदौरिया
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