Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

सत्य की छेनी

 

सत्य की छेनी

✍️अमरेश सिंह भदौरिया

मौन की ओट में
अब और नहीं छिप सकता यथार्थ।

तुम कहते हो
कि शब्दों की मर्यादा की एक लक्ष्मण-रेखा होती है,
पर जब अन्याय की अग्नि
दहलीज़ लांघकर भीतर आ जाए,
तब शब्दों का मौन रहना
किसी अपराध से कम नहीं होता।

इतिहास गवाह है—
जब-जब लेखनी ने
सत्ता के गलियारों में ‘जी-हुज़ूर’ कहा है,
तब-तब समय के शिलालेखों पर
स्याही नहीं, रक्त के धब्बे उभरे हैं।

मैं कैसे स्वीकार कर लूँ
उस शांति को,
जो भीतर ही भीतर
सत्य का गला घोंट रही हो?

मैं कैसे पढ़ूँ
उन पंक्तियों को,
जो केवल स्तुतिगान के छंदों में ढली हों?

मेरी कलम का संघर्ष
किसी सिंहासन के विरुद्ध नहीं,
बल्कि उस ‘चुप’ के विरुद्ध है
जो अधर्म को अधिकार देती है।

यदि सच कहना विद्रोही होना है,
तो हाँ—मैं विद्रोही हूँ।
यदि पीड़ा को स्वर देना अपराध है,
तो मेरा दंड निर्धारित करो।

पर याद रहे—
समय के निर्दयी पत्थर पर
जब सत्य की छेनी चलती है,
तो वह किसी ‘भय’ या ‘प्रतिबंध’ की
मोहताज नहीं होती।

कलम की नोक पर टिका संकल्प
अगाध है,
अबाध है,
और अनिवार्य है।


Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ