सस्ती लोकप्रियता
अमरेश सिंह भदौरिया
भीड़ के कोलाहल में
सिर्फ़ आवाज़ें सुनी जाती हैं,
सच का वजन
अक्सर हल्का पड़ जाता है।
लोग तालियाँ बजाते हैं
बिना समझे,
बिना परखे—
बस इसलिए कि
शब्द ऊँचे थे,
और अभिनय ठोस।
सस्ती लोकप्रियता
कभी विचारों का मूल्य नहीं पूछती,
वह केवल भीड़ की थकान पर
अपना पैर रखकर
ऊँचा हो जाना चाहती है।
जो जितना तेज़ चिल्लाता है,
वह उतना ही बड़ा माना जाता है—
मानो सत्य का जन्म
ध्वनि की ऊँचाई से होता हो।
और हम—
धीमे बोलने वाले,
सोचने वाले,
संकोची,
एक कोने में खड़े
अपने आप से पूछते हैं—
क्या सार्थकता का
कोई मंच अब भी बचा है?
पर फिर समझ आता है—
लोकप्रियता चाहे जितनी सस्ती हो,
पर विचार,
अगर सच्चे हों,
तो देर से ही सही,
अपना रास्ता बना ही लेते हैं।
भीड़ बदलती है,
रुझान बदलते हैं,
पर सच—
कभी फैशन नहीं बनता।
वह बस
मनुष्यता की रीढ़ की तरह
सीधा खड़ा रहता है।
और तभी महसूस होता है—
सस्ती लोकप्रियता का शोर
जितना ऊँचा होता है,
उसके पीछे का खालीपन
उतना ही गहरा।
सच मौन है,
पर स्थायी है।
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