सरस्वती वंदना
हे माँ,
कहीं कोई शब्द
मन के कोने में दबी हुई वीणा का स्वर ढूंढ रहा है।
कहीं कोई सपना
अधूरी किताब के पन्नों में स्याही तलाश रहा है।
तुम आओ —
बिखरी हुई चेतना को
अर्थ का वस्त्र पहना दो।
खामोश अक्षरों को
अपने नाम की पुकार दे दो।
माँ,
तुम्हारे बिना
शब्द बस शब्द रहते हैं,
भावों की नाव
मझधार में डगमगाती है।
तुम्हारी छाया
सोच को दिशा देती है,
तुम्हारी मुस्कान
हर प्रश्न का उत्तर बन जाती है।
आज फिर
मन के खाली आँगन में
तुम्हारा आशीष बरसे,
वीणा की तान में
बुद्धि का उजास भर दो।
काग़ज़ की ये कोरी दीवारें
तुम्हारे स्पर्श से बोल उठें।
हर अधूरी कविता
तुम्हारे नाम की वंदना बन जाए।
हे ज्ञानगंगा,
बस इतना कर दो —
कि जब भी कुछ लिखूँ, बोलूँ या सोचूँ,
उसमें सच्चाई की रोशनी हो।
ताकि हर स्वर, हर विचार
अंधेरे से टकराकर
ज्ञान के उजाले से अपने को आलोकित कर ले।
©®अमरेश सिंह भदौरिया
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