संयम और साहस का पर्व
अमरेश सिंह भदौरिया
कैलेंडर पर
लाल अक्षरों में लिखा
“नवरात्रि”
पर मेरे भीतर
यह किसी तारीख़ की नहीं
एक जागरण की शुरुआत है।
शहर की गलियों में
ढोलक की थाप,
सजते पंडाल,
देवी के चेहरे पर
लाल सिंदूरी आभा —
पर मैं देखता हूँ
उस देवी को
जो अपने भीतर की
भय, थकान,
और हज़ारों साल की चुप्पियों को
तोड़कर उठ खड़ी होती है।
यह सिर्फ़ पूजा नहीं,
यह अभ्यास है
अपने भीतर की शक्ति को
फिर से पहचानने का।
बचपन में
मैंने माँ को
उपवास करते देखा था,
अब लगता है
वह भूख से ज़्यादा
संयम और विश्वास की
तपस्या थी।
नवरात्रि मेरे लिए
ढोल, आरती और भोग से आगे
एक संवाद है—
जिसमें
मैं अपनी ही कमज़ोरियों को
देवी के चरणों में रख
अपना साहस उठा लेता हूँ।
आज
जब पहली आरती गूँजती है,
मैं सोचता हूँ
कि शायद
देवी मंदिरों से उतरकर
हमारे भीतर ही बसना चाहती हैं।
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