सकठू की दीवाली
अमरेश सिंह भदौरिया
सकठू आज फिर दीया जला रहा है—
वही टूटी चौकी, वही आधा दिया,
और वही उम्मीद
जो हर साल तेल खत्म होने से पहले बुझ जाती है।
उसकी बीवी कहती है—
“छोड़ो जी, इस बार दीया मत जलाइए,
तेल भी महँगा है और उजाला अब
मोबाइल की स्क्रीन पर आता है।”
सकठू हँस देता है,
उस हँसी में मिठाई का स्वाद नहीं,
बस वक्त की कटुता घुली है।
कहता है—
“दीवाली तो मनानी ही पड़ेगी,
वरना गाँव वाले कहेंगे—
सकठू अब शहर वालों की तरह अकड़ गया!”
घर में बिजली नहीं,
पर नोटिस तीन बार आ चुके हैं।
बच्चे स्कूल की फीस पूछते हैं,
सकठू कहता है—
“फिलहाल तो लक्ष्मी जी प्रधान जी के घर रुकी हैं।”
उधर प्रधान जी की छत पर झालरें झिलमिला रही हैं,
केक कट रहा है,
ड्रोन कैमरे से फोटो खिंच रहे हैं।
सकठू अपने दीए की लौ देखकर सोचता है—
“हमारे हिस्से का उजाला भी शायद
किसी पोस्टर में चला गया।”
रात के सन्नाटे में
सकठू के दीए की बाती झिलमिलाती है—
जैसे अंधेरे से लड़ने की उसकी आखिरी कोशिश।
वह कहता है—
“हर साल सोचता हूँ, अबकी कुछ बदलेगा,
पर हर साल दीया छोटा पड़ जाता है
और अंधेरा बड़ा।”
फिर भी वह दीया जलाता है—
क्योंकि उसे डर है,
अगर बुझा दिया तो
सरकार कहेगी—
“देखो, लोगों ने खुद ही रोशनी छोड़ दी।”
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