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साहित्य : समाज का दर्पण और युग-चेतना

 

Amresh Singh 


Mon, Aug 3, 8:39 PM (9 hours ago)




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साहित्य : समाज का दर्पण और युग-चेतना

✍️ अमरेश सिंह भदौरिया

साहित्य केवल शब्दों का जमावड़ा, मनोरंजन का साधन या कोरी कल्पनाओं का संसार नहीं है। साहित्य मनुष्य की चेतना, उसके सामाजिक सरोकारों और युगीन परिस्थितियों की वह सजीव अभिव्यक्ति है जो समाज को उसका असली चेहरा दिखाती है। हिंदी साहित्य के युग-प्रवर्तक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने साहित्य को परिभाषित करते हुए लिखा था कि साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है। इसी दार्शनिक चिंतन को जब हम व्यावहारिक धरातल पर समझते हैं, तो आचार्य द्विवेदी की यह कालजयी स्थापना सामने आती है कि साहित्य समाज का दर्पण है।

यह परिभाषा कोई यूँ ही गढ़ी गई पंक्तियाँ नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा तर्क है। दर्पण का मूल काम क्या होता है? दर्पण अपने सामने आने वाले व्यक्ति या वस्तु की सुंदरता, कुरूपता, दाग और सच्चाई को बिना किसी मिलावट या लाग-लपेट के ज्यों का त्यों बिंबित कर देता है। वह सुंदर को सुंदर और बदसूरत को बदसूरत दिखाने में कोई पक्षपात नहीं करता। ठीक यही काम साहित्य का भी होता है। साहित्य अपने युग की अच्छाइयों और नैतिक ऊँचाइयों के साथ-साथ समाज की सड़न, विकृतियों और क्रूर यथार्थ को भी पूरी ईमानदारी से समाज के सामने ला खड़ा करता है।

भारतीय साहित्य का अध्ययन करें तो रामचरितमानस और महाभारत दो ऐसे महाग्रंथ हैं जो आचार्य द्विवेदी की इस परिभाषा की कसौटी पर पूरी तरह खरे उतरते हैं। ये दोनों ग्रंथ अपने-अपने कालखंड के समाज का प्रामाणिक दर्पण हैं। जहाँ गोस्वामी तुलसीदास कृत 'रामचरितमानस' उस युग के आदर्श समाज का दर्पण प्रस्तुत करता है कि समाज को कैसा होना चाहिए, वहीं 'महाभारत' अपने युग के यथार्थवादी समाज का वह नग्न दर्पण है जो दिखाता है कि नैतिक पतन के बाद समाज कैसा बन जाता है।

यदि हम दोनों युगों में गुरु की प्रतिष्ठा और आश्रम परंपरा को देखें, तो बड़ा स्पष्ट अंतर समझ आता है। रामचरितमानस में गुरु केवल ज्ञान बांटने वाले शिक्षक नहीं, बल्कि समाज के नैतिक दिशा-निर्देशक और सर्वोच्च सत्ता हैं। राजा दशरथ चक्रवर्ती सम्राट होते हुए भी महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र के सामने नतमस्तक रहते हैं। भगवान राम स्वयं राजसी वैभव और महलों के सुख को त्यागकर गुरु के आश्रम में जाकर कठोर साधना के बीच शिक्षा ग्रहण करते हैं। यह इस सामाजिक यथार्थ का दर्पण है कि उस युग में ज्ञान, त्याग और गुरुत्व का स्थान राजसत्ता से कहीं ऊँचा था। इसके ठीक विपरीत महाभारत का दर्पण इस व्यवस्था के पतन की तस्वीर दिखाता है। यहाँ गुरु-शिष्य परंपरा का पवित्र ढांचा टूटने लगता है। कौरव और पांडव राजकुमारों को दीक्षा देने के लिए गुरु द्रोणाचार्य को स्वयं राजप्रासाद में आना पड़ता है और वे राजसत्ता की रोटियों तथा राजनीतिक परिस्थितियों के बंधक बन जाते हैं। जब गुरु आश्रम छोड़कर राजभवन का आश्रित बन जाता है, तो उसकी निष्पक्षता समाप्त हो जाती है। इसी का दुष्परिणाम था कि द्रोणाचार्य को एकलव्य का अंगूठा माँगना पड़ा और कर्ण को सूत-पुत्र कहकर विद्या से वंचित किया गया। यह दिखाता है कि जब गुरु सत्ता के अधीन होता है, तो शिक्षा में पक्षपात और अन्याय का जन्म होता है।

इसी तरह नारी के सम्मान और उसके सामाजिक मूल्य को लेकर भी दोनों ग्रंथों में जमीन-आसमान का अंतर दिखता है। रामचरितमानस में नारी का सम्मान समाज की सर्वोच्च प्राथमिकता और मर्यादा की कसौटी है। सीता केवल एक पत्नी नहीं, बल्कि पूरे समाज के स्वाभिमान का प्रतीक हैं। जब एक अत्याचारी सत्ता द्वारा सीता का हरण होता है, तो राज सिंहासन पर बैठे राम नहीं, बल्कि वनवासी राम समाज के सबसे उपेक्षित, बिखरे और वंचित वर्ग कोल, किरात, रीछ और वानरों को संगठित करके एक विशाल लोक-सेना बनाते हैं। वे उस रावण को चुनौती देते हैं जिसके दरबार में काल और दसों दिशाओं के पाल स्वयं बंदी थे। एक नारी के सम्मान की रक्षा के लिए समुद्र पर पुल तक बांध दिया जाता है। साहित्य यहाँ यह दर्पण दिखाता है कि एक सुसंस्कृत समाज नारी रक्षा के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा देता है। दूसरी ओर, महाभारत का दर्पण उस युग के सामाजिक और नैतिक पतन का अत्यंत कड़वा और नग्न सत्य प्रस्तुत करता है। यहाँ नारी का सम्मान किसी एकांत जंगल में नहीं, बल्कि कुरुवंश की भरी द्यूत-सभा में, देश के सबसे बड़े ज्ञानियों, योद्धाओं और पूज्य वयोवृद्धों के सामने ताश और शतरंज की बिसात पर दांव पर लगा दिया जाता है। द्रौपदी का चीरहरण और उस पर ज्येष्ठ कुरुश्रेष्ठों की लाचार खामोशी इस बात का ठोस प्रमाण है कि समाज में नारी केवल एक वस्तु बनकर रह गई थी। जहाँ रामचरितमानस में नारी सम्मान के लिए युद्ध रचा गया, वहीं महाभारत यह यथार्थ दिखाता है कि जब नारी के अपमान पर पूरा समाज मौन हो जाता है, तो उस समाज का संपूर्ण विनाश ही एकमात्र परिणति होती है।

भ्रातृ-प्रेम यानी भाई-भाई के संबंध की बात करें तो दोनों ग्रंथों का दर्पण दो बिल्कुल अलग तस्वीरें दिखाता है। रामचरितमानस भ्रातृ-प्रेम का ऐसा जीवंत और अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है, जिसकी मिसाल विश्व-साहित्य में दुर्लभ है। यहाँ अधिकारों का नहीं, बल्कि त्याग का द्वंद्व है। राम पिता के एक वचन पर सहर्ष 14 वर्ष का वनवास स्वीकार कर लेते हैं और राज्य छोड़ देते हैं। दूसरी ओर, भरत उस मिले हुए निष्कंटक राज्य को स्वीकार करने के बजाय राम की पादुकाओं को सिंहासन पर रखकर एक तपस्वी की तरह शासन चलाते हैं। लक्ष्मण और शत्रुघ्न का समर्पण पारिवारिक एकजुटता का उच्चतम आदर्श प्रस्तुत करता है। साहित्य यहाँ दिखाता है कि एक आदर्श परिवार और समाज की नींव पारस्परिक त्याग पर टिकती है। इसके विपरीत महाभारत में ठीक उल्टे सामाजिक यथार्थ का दर्पण मिलता है। यहाँ एक ही कुल के भाई संपत्ति, अधिकार और राज्य के लालच में एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं। दुर्योधन पांडवों को सुई की नोक के बराबर जमीन देने से भी साफ इनकार कर देता है। पारिवारिक ईर्ष्या, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और कड़वाहट इस हद तक बढ़ जाती है कि भाई ही भाई का गला काटने के लिए कुरुक्षेत्र के मैदान में आ खड़ा होता है। यह सिद्ध करता है कि जब समाज से त्याग की भावना खत्म होती है, तो रिश्तों का अंत कितना भयावह होता है।

यदि धर्म और नीति के स्वरूप पर विचार करें, तो रामचरितमानस के काल में धर्म और नीति अत्यंत सहज, स्पष्ट और मर्यादा-केंद्रित है। प्राण जाए पर वचन न जाए इस युग का मूल वाक्य है। व्यक्ति अपने सुख, अधिकारों और जीवन का बलिदान दे सकता है, लेकिन सत्य और धर्म के स्थापित नियमों को नहीं तोड़ सकता। यहाँ राम मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में स्थापित होते हैं, जो न्याय के रास्ते में कोई शॉर्टकट नहीं अपनाते। लेकिन महाभारत का साहित्य दिखाता है कि जब समाज जटिल और कुटिल हो जाता है, तो धर्म की सीधी परिभाषा काम नहीं करती। यहाँ आपद्धर्म और कूटनीति का बोलबाला है। परिस्थितियों के दबाव में स्वयं भगवान श्री कृष्ण को अधर्म के नाश के लिए युद्ध के पारंपरिक नियमों को मोड़ना पड़ता है। द्रोणाचार्य, कर्ण और दुर्योधन के वध के तरीके यह दर्शाते हैं कि जब सामने वाला सारे नियम तोड़ चुका हो, तो यथार्थवादी समाज में धर्म की रक्षा के लिए नीतियाँ बदलनी ही पड़ती हैं।

अंत में राजा और सत्ता के चरित्र को देखें तो रामचरितमानस में रामराज्य की अवधारणा का दर्पण है। यहाँ राजा प्रजा का सेवक है। राजा अपनी व्यक्तिगत खुशियों और पारिवारिक प्राथमिकताओं को प्रजा के सुख के पीछे रखता है। शासक का जीवन पूरी तरह पारदर्शी, नैतिक और लोक-कल्याणकारी है। जबकि महाभारत काल की राजनीति का दर्पण सत्ता के अंधाधुंध मोह और व्यक्तिवाद को दिखाता है। राजा धृतराष्ट्र का अपने पुत्र दुर्योधन के प्रति अंधा मोह न्याय के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बनता है। जब सत्ता पर बैठा व्यक्ति राष्ट्र और न्याय से ऊपर अपने परिवार या पुत्र को स्थान देने लगता है, तो राजसत्ता भ्रष्ट हो जाती है और अंततः साम्राज्य के पतन का कारण बनती है।

संक्षेप में कहें तो आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की यह परिभाषा कि साहित्य समाज का दर्पण है, केवल एक साहित्यिक अलंकार नहीं है, बल्कि एक सच्चा सामाजिक और ऐतिहासिक सत्य है। दर्पण का काम है समाज की तस्वीर को ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर देना। रामचरितमानस ने अपने समय के समाज का वह दर्पण दिखाया जिसमें मानवीय मूल्यों, रिश्तों, गुरु-भक्ति और नारी-सम्मान का उच्चतम आदर्श चमकता है। वहीं महाभारत ने अपने समय के समाज का वह दर्पण प्रस्तुत किया जिसमें सत्ता का लालच, नारी का अपमान, गुरुओं की लाचारी और भाइयों की दुश्मनी का नग्न यथार्थ दिखाई देता है। ये दोनों महाग्रंथ यह सिद्ध करते हैं कि साहित्य कभी झूठ नहीं बोलता। वह अपने समय के समाज का सच्चा दस्तावेज होता है जो हमें आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा भी देता है और जब हम नैतिकता से भटकते हैं, तो हमारे पतन का असली चेहरा दिखाकर हमें चेताता भी है। यही साहित्य की वास्तविक सार्थकता है।





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