ऋतुराज की अनुगामिनी
फरवरी
अमरेश सिंह भदौरिया
स्वर्ण आभा में नहाती फरवरी।
मौन अधरों को जगाती फरवरी।
रक्तवर्णा कोपलों की ओट से,
सृष्टि का यौवन सजाती फरवरी।
स्मृति कुंजों में प्रलय जो सुप्त थी,
मलय बन कर गुदगुदाती फरवरी।
शून्य पर अंकित अधूरे प्रश्न को,
मृदुल उत्तर दे मनाती फरवरी।
वंचनाओं की तपन को सोख कर,
नेह का अमृत पिलाती फरवरी।
काल की धूसर लिपि को काट कर,
प्राण-अक्षर फिर बनाती फरवरी।
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