राम की आत्मग्लानि
राजसिंहासन पर बैठे थे राम,
पर भीतर एक शून्य पसरा था—
जिसमें हर दिन सीता की चुप्पी
गूँजती थी—
ठीक शंखनाद के बाद की निस्तब्धता जैसी।
उन्होंने धर्म निभाया था,
पर क्या इंसान भी रह पाए?
राजधर्म के नाम पर
उन्होंने छोड़ दिया था वह स्त्री,
जो जंगल से अग्नि तक
हर कसौटी पर खरी उतरी थी।
प्रजा की बातों से डर गया था राजा,
और पति…
वो तो उस दिन मर ही गया था
जब सीता को "शुद्धि" के लिए
अग्नि में खड़ा किया।
राम अकेले थे—
जनकपुत्री तो चली गई धरती में,
पर राम हर रात
अपने निर्णय के जलते अक्षरों को पढ़ते रहे।
मंदिरों में भगवान हैं वो,
पर मन के भीतर
कभी-कभी सिर्फ़ एक टूटा हुआ प्रेमी।
राम जानते थे—
उनका सबसे बड़ा युद्ध रावण से नहीं,
सीता से आँख मिलाने में था।
उनके हर यशगान के नीचे
एक चुप आर्त स्वर छिपा है—
“मैं राजा तो था,
पर शायद अच्छा प्रेमी नहीं बन पाया।”
राम की आत्मग्लानि
कभी अश्रु बनकर नहीं बही,
वो मर्यादा के भीतर दफ़न रही।
और यही वो चुप्पी है,
जिसमें हर युग की स्त्रियाँ
अपना जवाब ढूँढती हैं।
©®अमरेश सिंह भदौरिया
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