रहट
खेत के कोने में अब भी
जंग खाई एक रहट खड़ी है—
बिलकुल वैसे ही
जैसे दादी की कहानियाँ
जो अब कोई नहीं सुनता।
कभी
उसकी साँकलें गूंजती थीं
गायों के रंभाने और
कुएँ के जल की टप-टप संग—
कभी यह धुरी थी
गाँव की धड़कनों की।
वह बैल,
जिसकी आँखों पर पट्टी बंधी होती,
जानता था
घूमना ही उसकी नियति है—
फिर भी
हर चक्कर में
पानी उलीचता रहा
किसी और की प्यास बुझाने को।
रहट
सिर्फ एक यंत्र नहीं थी—
वह श्रम का संगीत थी,
वह विश्वास थी
कि हर मेहनत का फल
अंततः जीवन देता है।
अब वह चुप है—
उसके काँधे थक चुके हैं,
साँकलें चुपचाप जंग खा रही हैं,
और
बैल की जगह अब
मशीनें हैं
जिनमें संवेदनाएँ नहीं।
©®अमरेश सिंह भदौरिया
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