पुस्तक समीक्षा
विषमता में साम्य का शिव-दर्शन : 'शिव के रंग'
कृति : शिव के रंग (काव्य-संग्रह)
कृतिकार : दीनानाथ द्विवेदी 'रंग'
आवासीय पता : ग्राम - बाँसगाँव, पत्रालय - कोटडीह, जनपद - अयोध्या (उत्तर प्रदेश)
डाक सूचकांक : 224158
दूरभाष : 8887885241
प्रकाशक : हिंदी श्री प्रकाशन, भदोही (उत्तर प्रदेश)
दीनानाथ द्विवेदी 'रंग' जी का संकलित काव्य-ग्रंथ 'शिव के रंग' समकालीन हिंदी भक्ति-साहित्य एवं लोकाध्यात्म की समृद्ध परंपरा में एक अत्यंत दिव्य, सुरभित और नव्यता से परिपूर्ण पवन-प्रवाह के समान अवतरित होता है। यह संकलन पाठक को केवल पारंपरिक स्तुति-गाथाओं तक ही सीमित नहीं रखता, अपितु देवाधिदेव महादेव के वैविध्यपूर्ण, सर्वसमावेशी और लोक-मंगलकारी स्वरूप का दर्शन कराता है। इस काव्य-कृति की पंक्तियों से गुजरते हुए स्पष्ट अनुभूति होती है कि सर्जक का चेतना-पुंज केवल अपनी निजी भावुकता या वैयक्तिक अर्चना में निमग्न नहीं है; वह तो शिव-परिवार के उस अमूर्त दर्शन और लोकोत्तर चेतना से भी गहराई से जुड़ा है, जो विषमताओं के भयावह भंवर के बीच भी परम शांति, परस्पर तालमेल और अखण्ड आनंद का मार्ग प्रशस्त करता है। यही कारण है कि इस संग्रह के पद्य जितने आत्मीय, गेय और भक्ति रस से आप्लावित हैं, उतने ही वे दर्शन और लोक-संवेदना के विविध पक्षों को अपने भीतर समाहित किए हुए हैं।
काव्य-रचना के आंतरिक धरातल पर प्रवेश करते ही जो वैशिष्ट्य पाठक को सर्वाधिक चमत्कृत करता है, वह है शिव-परिवार के परस्पर-विरोधी तत्वों के बीच निहित अलौकिक सामंजस्य का निरूपण। निष्ठा और समर्पण के धरातल पर इन पदों में अत्यंत निश्छल, शुद्ध और पावन भाव-धारा प्रवाहित होती है। यहाँ भवानी-शंकर का परिवार केवल एक पौराणिक आख्यान मात्र नहीं है, वरन संपूर्ण प्राणी-संसार के लिए विषमताओं के बीच भी साम्य और सौहार्द के साथ जीने का एक अनुपम तथा जीवंत आदर्श है। ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय का वाहन मयूर है, तो अनुज श्रीगणेश का वाहन मूषक है; वहीं शिव के कंठ में विषधर भुजंग सुशोभित हैं। प्राकृतिक नियमानुसार मोर सर्प को और सर्प मूषक को अपना आहार बनाता है, किंतु शिव-धाम में ये सभी प्राणी परस्पर विद्वेष त्यागकर परम प्रेम से निवास करते हैं। इसी प्रकार, भोलेनाथ का वाहन वृषभ (बैल) कभी माता भवानी के वाहन सिंह से भयभीत नहीं होता। विरोधाभासों में ऐसा अभूतपूर्व साम्य केवल आशुतोष के ही प्रांगण में संभव है।
"बैल की सवारी गृहस्वामी अपनाये 'रंग' ; सिंह की सवारी गृहस्वामिनी की खास है। वाहन षडानन का मोर है परन्तु कभी ; करे ना गजानन के मूषक का ग्रास है॥"
परंतु इस संग्रह के सर्जक का दृष्टिकोण केवल पौराणिक आख्यानों के पारंपरिक पुनराख्यान तक सीमित नहीं है। उनका संवेदनशील हृदय आज के युग में संघर्षरत मनुष्य की पीड़ा, आंतरिक संताप और सांसारिक विषमताओं से उपजे अवसाद को देखकर द्रवित हो उठता है। संग्रह के पदों में कलिकाल की विषमताओं और मानवीय संघर्ष का मार्मिक चित्रण हुआ है। देवाधिदेव नीलकंठ ने तो जगत् की रक्षा हेतु केवल एक बार समुद्र-मंथन से निकला हलाहल पिया था, परंतु आज का आम इंसान अपनी दिनचर्या में, परिस्थितियों के दबाव में और समाज में व्याप्त छल-छद्म के बीच पल-पल विष पीने को अभिशप्त है।
इसी भांति, भौतिकतावादी अंधी दौड़ में पिसती जनसामान्य की चेतना, अंतर्मन के द्वंद्व और कलिकाल के प्रभाव को कवि ने अत्यंत संवेद्य भाव से शब्दबद्ध किया है। भक्ति एवं प्रपत्ति के इसी धरातल पर कवि शिव को केवल प्रलयंकर या संहारक के रूप में ही नहीं पुकारता, बल्कि उन्हें आशुतोष, महामृत्युंजय और दुःखों का हरण करने वाले परम दयालु पिता के रूप में ध्याता है। समकालीन जीवन के इस तीखे यथार्थ और मार्मिक सत्य को अभिव्यक्त करती यह काव्य-पंक्ति विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करती है—
"एक बार आपने हलाहल पिया परन्तु ; 'रंग' यहाँ रोज बार-बार विष पीता है॥"
पारिवारिक मूल्यों, सांस्कृतिक विरासत और गुरु-जनों के प्रति कृतज्ञता की जो अजस्र धारा इस कृति के मूल में प्रवाहित है, वह अत्यंत श्लाघनीय है। रचयिता ने ग्रंथ के आरंभिक पृष्ठों में अपनी ममतामयी माँ, पूज्य पिता, परिजनों, सहयोगियों एवं गुरुजनों के प्रति जिस अगाध आदर-भाव का संकीर्तन किया है, वह भारतीय मूल्य-परंपरा और पितृ-ऋण की महत्ता को रेखांकित करता है।
एक तटस्थ एवं निष्पक्ष समीक्षक की दृष्टि से यदि इस कृति का सूक्ष्म प्राविधिक, शास्त्रीय एवं संरचनात्मक विश्लेषण किया जाए, तो जहाँ एक ओर भाव-प्रवाह सघन है, वहीं दूसरी ओर छंद-शास्त्र, भाषा-शैली और मुद्रण परिष्कार के स्तर पर कुछ गंभीर सीमाओं की ओर ध्यान आकर्षित करना अनिवार्य हो जाता है।
सर्वप्रथम, छंद-विधान के धरातल पर, कवि ने मुख्यतः मनहरण घनाक्षरी छंद की संरचना को अपनाया है, जिसमें प्रत्येक चरण में 31 वर्ण तथा निर्धारित यति-गति (विश्राम-नियम) का कड़ाई से पालन अनिवार्य होता है। परंतु संग्रह के अनेक पदों में यति के नियमों का कड़ाई से निर्वाह न होने के कारण पाठकीय प्रवाह में बाधा आती है। उदाहरणार्थ, पद संख्या 3 में पंक्ति—"यति गति लय तुक ताल कुछ ज्ञात नहीं ; कविता को आकर निखार दीजिये प्रभू।"—में कवि ने स्वयं अपनी छंद-विषयक अभिज्ञता की सीमा को स्वीकार किया है। घनाक्षरी छंद में यति प्रायः 16 और 15 वर्णों पर अथवा 8-8-8-7 के विश्राम पर निर्धारित होती है; किंतु संग्रह के कई पदों में निर्धारित स्थान पर ही शब्द का अप्राकृतिक विभाजन (शब्द-भंग दोष) हो जाता है, जिससे सस्वर वाचन करते समय गेयता और लयबद्धता खंडित होती है। उदाहरण के लिए, पद संख्या 1 में "मूक को वाचाल करो कु चल सुचाल करो" पंक्ति में 'कुचाल' शब्द का 'कु' और 'चल' में विभाजन इस छंदोलंकारिक शिथिलता को स्पष्ट करता है।
द्वितीयतः, शिल्प और बिंब-विधान की दृष्टि से रचनाकार ने अधिकांशतः पारंपरिक शब्दावली और रूढ़ उपमानों का पुनरावर्तन किया है। यद्यपि भक्ति-रस में भाव की प्रधानता होती है, फिर भी अनेक पदों में एक ही विचार और भाव की बारंबार पुनरावृत्ति (पुनरुक्ति दोष) दिखाई देती है, जिससे काव्य का कसाव शिथिल पड़ता है। उदाहरणार्थ, पद संख्या 3 और पद संख्या 169 में एक ही विचार को लगभग समान शब्दावली में दोहराया गया है—"एक बार आपने हलाहल पिया परन्तु ; 'रंग' यहाँ रोज बार-बार विष पीता है।" इसी प्रकार, पद संख्या 16, 71 और 152 में अंतकाल में प्रभु से कान में 'राम नाम' का मंत्र फूंकने की एक ही प्रार्थना की पुनरावृत्ति हुई है। यद्यपि दैन्य और प्रपत्ति के भाव में ऐसी पुनरावृत्ति स्वाभाविक मानी जाती है, फिर भी एक ही संग्रह में समान विचार का बार-बार आना काव्य के शिल्पीय परिष्कार को थोड़ा प्रभावित करता है।
तृतीयतः, भाषा और व्याकरण के स्तर पर भी कुछ स्थानों पर मात्राओं की कमी-वेशी तथा शब्दों के चुनाव में अनगढ़ता दिखाई देती है। कवि ने जहाँ एक तरफ कड़े संस्कृत शब्दों का प्रयोग किया है, वहीं दूसरी ओर आम बोलचाल के देसज शब्दों (जैसे— 'बाउर', 'पांव', 'पनही', 'खोटी', 'टाट', 'अधेला' आदि) को भी रख दिया है, जिससे काव्य-शास्त्र की दृष्टि से यह तालमेल कहीं-कहीं थोड़ा कमजोर लगता है। यदि आने वाले अगले संस्करण में इन भाषाई, मुद्रण संबंधी और प्राविधिक कमियों को सुघड़ संपादकीय सुधार के साथ ठीक कर दिया जाए, तो इस काव्य-संग्रह की सुंदरता और भी अधिक निखर जाएगी।
प्रस्तुतिकरण एवं समग्र मूल्यांकन के प्रतिमानों पर यह कृति सुविचारित और प्रभावकारी है। पुस्तक का समर्पण, मंगलाचरण और आवरण-चित्र कवि के अध्यात्म-संसार और उदात्त दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है। कुछ प्राविधिक एवं शास्त्रीय सीमाओं के बावजूद, यह काव्य-ग्रंथ केवल एक सामान्य धार्मिक संकलन नहीं है, अपितु समकालीन हिंदी भक्ति-साहित्य और काव्य-परंपरा में एक उल्लेखनीय एवं दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ने वाला सदिच्छापूर्ण प्रयास है।
एक परिपक्व, गरिमापूर्ण और भाव-समृद्ध काव्य-प्रयास के रूप में यह कृति अत्यंत सराहनीय है। इन छंदों में भगवान शिव के प्रति अटूट निष्ठा, लोक-कल्याण का संकल्प और भक्ति-रस का जो अनुपम ताना-बाना रचा गया है, वह सहृदय पाठक के अंतस को अध्यात्म के प्रकाश से आलोकित करता है। यह काव्य-संग्रह न केवल दीनानाथ द्विवेदी 'रंग' जी की काव्य-साधना का प्रमाण है, बल्कि हिंदी की भक्ति-काव्य धारा को और अधिक समृद्ध व पल्लवित करने वाला एक ऐतिहासिक कदम भी है।
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