
पुस्तक समीक्षा
ख्वाहिशों की धार पर छटपटाती मनुष्यता और यथार्थ का खुरदुरा आईना
कृतिकार : संजय मनहरण सिंह
कहानी-संग्रह : ‘ख्वाहिशों की धार से’
प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रयागराज
डाक सूचकांक : 211001
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समकालीन हिंदी कहानी जब नवउदारवादी चमक-दमक के अमूर्त विमर्शों और मध्यवर्गीय कुंठाओं के गोल घेरे में लगातार सिमट रही है, तब संजय मनहरण सिंह का कहानी-संग्रह ‘ख्वाहिशों की धार से’ (लोकभारती प्रकाशन) यथार्थ की उस खुरदुरी, बदबूदार और उपेक्षित ज़मीन को कथा-साहित्य के केंद्र में ले आता है जिसे मुख्यधारा का विमर्श अक्सर अदृश्य कर देता है। यह संग्रह परंपरा से सीधे संवाद करता है। जहाँ प्रेमचंद की 'कफ़न' में घीसू और माधव के माध्यम से व्यवस्था-जनित संवेदनहीनता का चरम दिखाई देता है, वहीं संजय मनहरण सिंह की कहानियाँ इक्कीसवीं सदी के उपभोक्तावादी दौर में उस संवेदनहीनता के और अधिक भयावह, संस्थागत और आत्मघाती रूपों को दर्ज करती हैं। उदय प्रकाश ने जहाँ अपनी कहानियों में तंत्र और उत्तर-आधुनिक बाज़ार द्वारा मानवीय गरिमा के छीने जाने को रेखांकित किया था, वहीं संजय जी के यहाँ यह संकट किसी भव्य रूपक के रूप में नहीं, बल्कि अत्यंत सूक्ष्म, घरेलू और त्रासद ब्योरों के माध्यम से घटित होता है। यह संग्रह जीवन के बुनियादी सवालों—भूख, देह, विस्थापन, पारिवारिक अलगाव और प्रकृति के विनाश—को बाज़ार और पितृसत्ता की क्रूर कतरनी के बीच रखकर परखता है।
संग्रह का आरंभ ‘आपका बेटा अमेरिका में है ना!’ से होता है, जो वैश्वीकरण और सूचना-क्रांति के दौर में उपजे विदेशी सपनों के अंतःसारहीन खोखलेपन का निर्मम मनोवैज्ञानिक विच्छेदन करती है। वृद्ध परितोष शर्मा यानी ‘गार्ड बाबू’ का चरित्र उस वृद्ध पीढ़ी का साझा संत्रास है जिसे संतान की तथाकथित वैश्विक सफलता के बदले भयानक एकाकीपन, अनिद्रा और बीमारियों की यातना मिली है। विदेशी मुद्रा, बीमा और अंतर्जाल पर दृश्य-संवाद के सुरक्षा-कवच के बीच जब परितोष बाबू मच्छर जैसे झिलमिलाते दूरदर्शन पटल और झींगुरों की कर्कश आवाज से लड़ते हैं, तो उनकी स्मृतियों में स्वर्गीय पत्नी आशा का सहज सवाल कौंधता है—"आप इतने संकोची क्यों हैं?" कहानी का चरमोत्कर्ष दूरदर्शन पर ग्यारह सितंबर के आतंकी हमलों के कोलाहल और मदिरालय के उस दृश्य में आता है, जहाँ संचालक सरदारजी के आत्मीय सवाल—"अरे गार्ड बाबू कहाँ थे इतने दिन?... आपका बेटा भी अमेरिका में है ना?" के उत्तर में परितोष बाबू के चेहरे पर एक खाली, कातर मुस्कान तैरती है और उनके मुँह से निकलता है—"साला बुश भी तो अमेरिका में है!" यह वाक्य मात्र खीझ नहीं, बल्कि सीमाओं, महाशक्तियों और सुरक्षा के उस छद्म पर गहरा तंज है जिसने रिश्तों को महज़ औपचारिक संवाद में बदल दिया है।
दूसरी कहानी ‘सफेद रंग की स्कूटी’ निम्न-मध्यवर्ग के उस वित्तीय दलदल और छद्म प्रतिष्ठा की पड़ताल करती है जो आज मासिक किश्तों और उपभोक्तावाद के दम पर खड़ी है। साझा आंगन और किराए की खोली में जी रहे नान्हू का श्रम, साइकिल का पैडल मारते हुए फूलते फेफड़े और ताई की बेटी माधुरी के प्रति उसका संकोची आकर्षण उस वर्गीय हीनता को रेखांकित करता है जहाँ ताई का हँसी-मजाक में पूछना—"माझा जावाई बनशील काय?"—नान्हू के हलक में तंबाकू अटका देता है। कहानी में दोपहिया वाहन की आमद पूरे परिवार के लिए सामाजिक छलांग का माध्यम बनती है; आरती की थाली घूमती है और भाई गर्व से फूलकर कहता है—"चालीस हजार की स्कूटी की आवाज कितनी मधुर है ना आई?" लेकिन लेखक ने किश्तों पर खरीदी गई इस क्षणभंगुर चमक का पटाक्षेप अत्यंत क्रूर यथार्थ से किया है। जब नान्हू गाँव से लौटकर माधुरी के बंद दरवाजे पर ताला देखता है, तो कुबड़ी मकान मालकिन का यह संवाद कहानी के पूरे भ्रम को तोड़ देता है—"अरे मूर्ख उसके बाप ने किश्त जमा नहीं की थी इसलिए बैंक वाले गाड़ी सीज कर ले गए।"
तीसरी कहानी ‘एक गरीब कहानी’ अभावों के बीच मानवीय संवेदनाओं के क्षरण की रूह कँपा देने वाली दास्तान है। यह रचना सीधे तौर पर प्रेमचंद की 'कफ़न' के उस अंधेरे की याद दिलाती है जहाँ भूख और विवशता आत्मीयता को लील जाती है। फुलकी का चरित्र भारतीय समाज की उस मूक स्त्री का प्रतीक है जो पति दोरहा की घरेलू हिंसा, शराब की दुर्गंध और संधिशोथ यानी जोड़ों के दर्द से मुड़ी उंगलियों के बीच भी शिक्षामित्र बनने का स्वप्न देखती है। विडंबना यह कि उसकी उसी संभावित आय के बूते दोरहा बैंक से वाहन का कर्ज निकलवा लेता है। वहीं उसका बेटा सुखवा उस आधुनिक, आत्ममुग्ध युवा पीढ़ी का कुरूप चेहरा है जो माँ की बदहाली और सूखे पत्तों जैसी देह से बेपरवाह होकर केवल भौतिक सुविधाओं के लिए गुर्राता है—"मुझे सैमसंग का स्मार्टफोन चाहिए, बस!" सुखवा की तेज रफ्तार बाइक अंततः फुलकी की जान ले लेती है। जब आंगन में फुलकी का लहुलुहान शव अंतिम संस्कार की प्रतीक्षा कर रहा होता है, उस समय घर के बिखरे सामान के बीच सुखवा का पीछे मुड़कर बिना किसी लज्जा के कहना—"माँ का एटीएम कार्ड ढूँढ रहा हूँ"—मानवीय रिश्तों के नैतिक अवसान की ऐसी पराकाष्ठा है जो पाठक को सन्न कर देती है।
चौथी कहानी ‘यूजेनियो मोंताले को जानती है?’ महानगरीय विस्थापन, बौद्धिक कुंठा और देह के बाज़ार के जटिल द्वंद्व को उकेरती है। छत्तीसगढ़ से मुंबई आकर फिल्मों और पत्रकारिता में जगह तलाश रहा पर्जन्य अपनी कलात्मक महत्वाकांक्षा और आर्थिक लाचारी के बीच झूल रहा है। समुद्र तट पर संभ्रांत, एकाकी अनुभा से उसका जुड़ाव आरंभ में कला और साहित्य की परतों में उतरता है; जब अनुभा उसकी पंक्तियों पर मुग्ध होकर कहती है—"इस कविता को मेरे पूरे बदन पर लिख सकते हो तुम!"—तो लगता है कि दो अकेले मन एक-दूसरे को पा रहे हैं। लेकिन यह भ्रम तब टूटता है जब अनुभा अपने पति के स्वागत की तैयारी में पर्जन्य को तकिए के नीचे पाँच सौ के दो नोट रखकर चले जाने का आदेश देती है। इस अपमान से घायल पर्जन्य जब कमाठीपुरा पहुँचता है और देह-व्यापार में लगी रम्मो के सामने अपने दंभ में पूछता है—"तू बड़ा जानती है तो बता। यूजेनियो मोंताले को जानती है?" और रम्मो का सपाट उत्तर आता है—"वो मोंताले। उस पर तो मेरा पचास रुपया उधार है।"—तो यह संवाद नोबेल पुरस्कार विजेता साहित्य और दार्शनिक बहसों को पेट की भूख के आगे बेबस और नंगा खड़ा कर देता है।
पाँचवीं कहानी ‘ख्वाहिशों की धार से मारे जाने को’, जो इस संग्रह की शीर्षक कहानी भी है, लेखक के रचना-कौशल का चरमोत्कर्ष है। रेल पटरी के किनारे की गलीज बस्तियों, जले हुए तेल की गंध और कोयले की धूल के बीच एक किशोरी के लिए 'इमरती' मात्र स्वाद नहीं, बल्कि उस निषिद्ध दुनिया का सपना है जिससे वह बहिष्कृत है। जब वह तड़पकर कहती है—"उस नारंगी रंग की मिठाई को देखकर मैं पगला जाती हूँ। देखना एक दिन यह पागलपन मुझे ही भारी पड़ेगा।"—तो यह कथन उसके भविष्य की विभीषिका तय कर देता है। कल्लू हलवाई द्वारा उसका दैहिक शोषण और सहेली पेंचकी का यह निर्दयी सच—"हैरत से क्या देखती है, तू भी तो उस दिन होटल के पीछे इमरती खा रही थी!"—दिखाता है कि हाशिए पर हर छोटी इच्छा की कीमत अपनी गरिमा बेचकर ही चुकानी पड़ती है। हॉलीवुड अभिनेता के भित्तिचित्र से नाम बदलकर 'सिलबेसटर' बने साधनहीन लड़के की मालगाड़ी पर बिजली के तार से चिपककर हुई दर्दनाक मौत और उसकी तेरहवीं पर इमरती बँटने के दौरान बीमार आवारा कुत्ते की व्यंग्यात्मक मुस्कान पूरी व्यवस्था पर व्यवस्था-विरोधी अट्टहास की तरह दर्ज होती है।
छठी कहानी ‘बारह सौ की मैडम’ निजी शिक्षण संस्थानों में शिक्षित युवतियों के बौद्धिक-शारीरिक दोहन और मध्यवर्गीय संकीर्णता का प्रामाणिक समाजशास्त्रीय अध्ययन है। गणित में स्नातकोत्तर सोनमन को धर्मादा ट्रस्ट के विद्यालय में मात्र आठ सौ रुपये पर खटना पड़ता है, जहाँ विद्यालय प्रबंधक का गिद्ध दृष्टि से देखना और यह थोपना—"और मैडम यह सलवार सूट यहाँ नहीं चलेगा। कत्थई रंग की साड़ी मैडम लोगों के लिए अनिवार्य है।"—स्त्री-श्रम के वस्तुकरण को दर्शाता है। बड़ी बहन खोलमन की पैंतीस वर्ष की आयु में जवानी गलने के बाद उसका बेमेल विवाह एक अधेड़ विधुर से किया जाता है। जब सोनमन अपनी दीदी का हाथ थामकर कहती है—"कोई बात नहीं दीदी। मैं समझती हूँ तेरा दुख।"—तो यह मध्यवर्गीय कन्याओं के मौन विलाप की करुण अभिव्यक्ति बन जाता है। अंत में रोकड़ खिड़की पर बारह सौ रुपये गिनते हुए सोनमन का अपने जीवन के उसी संकीर्ण दायरे में सिमट जाना यह सिद्ध करता है कि डिग्रियाँ स्त्री को समाज की बेड़ियों से मुक्त नहीं करा पातीं।
सातवीं कहानी ‘अँधेरे के रंग में डूबा पेंटर’ मुक्तिबोध के अंतःसंघर्ष की याद दिलाती है जहाँ एक संवेदनशील कलाकार अपने भीतरी विखंडन, नशे, स्मृतियों और महानगरीय अकेलेपन से जूझता है। चित्रकार बार नर्तकी मोना की दैहिक मादकता और अस्पताल की परिचारिका लीज़ा के सेवा-भाव के बीच झूलता रहता है। मोना का यह पूछना—"प्यार में मारा गया है?"—और चाय की टपरी के लड़के छोटू से चित्रकार का स्मृति-भ्रम में कहना—"ओरे छोटू तुमने मेरी पेंटिंग से नदी चुराई है क्या?"—अपनी जड़ों से कट चुके व्यक्ति के आध्यात्मिक निर्वासन को दर्शाता है। अंत में दवाओं के खाली पत्तों, बिखरे गौरैया के पंखों और अधूरे चित्रपट के बीच जब छोटू दरवाजे पर पूछता है—"कुछ जास्ती जादू बना रहा है क्या?"—तब तक वह कलाकार अँधेरे के रंग में सदा के लिए विलीन हो चुका होता है।
संग्रह की अंतिम रचना ‘डरपोक मछली की तरह’ जल, प्रकृति और मनुष्य के आदिम संबंधों के विध्वंस पर केंद्रित एक उत्कृष्ट पारिस्थितिकीय व मिथकीय त्रासदी है। मछुआरा समुदाय की दादी का यह आदिम विश्वास कि "मछलियाँ हमारी पूर्वज हैं" विकासवादी कंपनियों द्वारा नदी पर बाँध बना दिए जाने और पिता के लहूलुहान होकर मरने के साथ ही चकनाचूर हो जाता है। कृत्रिम जलाशय में नौका दुर्घटना के समय जब झोकवा अपनी पत्नी देबजानी को नहीं बचा पाता, तो चाचा का तल्ख सच—"मूर्ख! तुझे मछलियों ने नहीं बचाया। तू डरकर अपनी पत्नी पर सवार हो गया था।"—उसे जीवन भर के आत्मघाती अपराधबोध में धकेल देता है। वृद्ध झोकवा का पानी की ओर खिंचे चले जाना और बच्चों के पूछने पर कि वह जलाशय के अंदर क्यों जा रहा था, धीमे से कहना—"देबजानी के पास।"—प्रकृति से बेदखल मनुष्य के अस्तित्वगत संकट का मार्मिक समापन करता है।
संजय मनहरण सिंह का कथा-शिल्प अमूर्त बौद्धिकता के बजाय अत्यंत ठोस और संवेदी दृश्य-विधान से निर्मित होता है। वे दृश्य को केवल दिखाते नहीं, बल्कि उसकी गंध और ध्वनि को पाठक के भीतर उतार देते हैं। जले हुए तेल की तीखी महक, कड़ाही से उछलती तेल की खौलती बूँदें, चाय के गिलासों की खनखनाहट, दूरदर्शन की मच्छर जैसी झिलमिलाती स्क्रीन, रंगों की उदास गंध और नाले के किनारे पड़े खाली डिब्बे—ये सभी विवरण किसी बंद कमरे की बौद्धिक कल्पना से नहीं, बल्कि ज़मीन पर उतरकर देखने से ही आते हैं। कहानियों के संवाद अत्यंत संक्षिप्त, मर्मभेदी और गहरे अंतर्निहित अर्थों से भरे हैं। लेखक लंबे भाषण देने के बजाय दो-तीन वाक्यों में पूरी सामाजिक व्यवस्था को उघाड़ देते हैं।
तमाम खूबियों और सघन यथार्थवाद के बावजूद, एक तटस्थ और सजग समीक्षक के रूप में इस संग्रह की कुछ गंभीर सीमाओं को अनदेखा नहीं किया जा सकता। लगभग सभी कहानियों में एक गहरा, दमघोंटू अवसाद और नियतिवाद व्याप्त है। पात्र व्यवस्था, गरीबी और शोषण के सामने केवल पिसते हैं, छटपटाते हैं और अंततः मर जाते हैं या आत्मसमर्पण कर देते हैं। प्रेमचंद या मुक्तिबोध के यहाँ त्रासदियों के बीच भी चेतना और प्रतिरोध की जो हल्की चिंगारी दिखाई देती है, वह यहाँ बुझी हुई जान पड़ती है; लेखक केवल अंधेरे की शिनाख्त करके रुक जाते हैं, मुक्ति का कोई रास्ता नहीं खोलते। इसके अतिरिक्त, कुछ कहानियों में पात्रों की बुनावट बहुत सपाट है। सुखवा अथवा विद्यालय का प्रबंधक बिना किसी आंतरिक द्वंद्व या मानवीय परत के केवल और केवल क्रूर व स्वार्थी दिखाई देते हैं। इसी तरह शिल्प के स्तर पर 'सफेद रंग की स्कूटी' में मुख्य विषय का बहुत देर से आना और 'आपका बेटा अमेरिका में है ना!' में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के संदर्भों का अत्यधिक विस्तार मूल मानवीय पीड़ा के प्रभाव को कई जगह शिथिल करता है।
इन संरचनात्मक और वैचारिक सीमाओं के बावजूद, यह निसंकोच कहा जा सकता है कि ‘ख्वाहिशों की धार से’ इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक की हिंदी कथा-यात्रा में एक महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय पड़ाव है। संजय मनहरण सिंह ने बाज़ार, विस्थापन, पितृसत्ता और उपभोक्तावाद के जिस वीभत्स गठजोड़ को इन आठ कहानियों में बेनकाब किया है, वह पाठक को किसी रूमानी मुगालते में नहीं छोड़ता। यह संग्रह हमें हमारी उस झूठी सुविधा और शांति से खींचकर उस जलते हुए यथार्थ के सामने खड़ा करता है जहाँ हर साधारण मनुष्य की बुनियादी ख्वाहिश ही उसकी हत्यारी बन चुकी है। यह एक ऐसी पुस्तक है जो बंद होने के बहुत देर बाद तक अपनी खुरदुरी भाषा, तीखे संवादों और बेचैन करने वाले सवालों के साथ पाठक की चेतना में गूंजती रहती है।
अमरेश सिंह भदौरिया
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