प्रसिद्ध और प्रबुद्ध
(सामाजिक मुखौटा बनाम व्यक्तिगत चरित्र)
अमरेश सिंह भदौरिया
आज का समाज एक अजीब विरोधाभास से गुजर रहा है। हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ 'दिखना' ही 'होना' मान लिया गया है। अक्सर जब मैं सार्वजनिक मंचों पर लोगों को नैतिकता, आदर्श और ज्ञान की बड़ी-बड़ी बातें करते देखता हूँ, तो मन में एक गहरा कौतूहल जगता है। लेकिन जब इन्हीं प्रसिद्ध चेहरों के व्यक्तिगत जीवन के एकांत को करीब से देखने या समझने का मौका मिलता है, तो सचमुच भीतर तक निराशा होती है। समाज में जो व्यक्ति जितनी अधिक प्रसिद्धि, प्रतिष्ठा या उच्च पद को प्राप्त है, कई बार उसका व्यक्तिगत चरित्र ठीक उसके विपरीत देखने को मिलता है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस दोहरेपन में उन लोगों का अनुपात बहुत अधिक है जो समाज के सबसे विद्वान, पढ़े-लिखे और तथाकथित 'शिक्षित' वर्ग में आते हैं।
अगर हम इसके पौराणिक संदर्भों को देखें, तो प्रकांड विद्वता और व्यक्तिगत चरित्र के इस भयानक अंतर का सबसे बड़ा उदाहरण 'रावण' है। रावण चारों वेदों का ज्ञाता था, महान शिव भक्त था, परम ज्ञानी और ज्योतिषाचार्य था। ज्ञान और विद्या के मामले में उसके युग में उसके बराबर कोई नहीं था। लेकिन जब बात उसके व्यक्तिगत चरित्र और आचरण की आई, तो वह अहंकार, पर-स्त्री हरण और अधर्म के अंधकार में डूब गया। उसकी सारी विद्वता उसके पतन को नहीं रोक सकी क्योंकि वह उसके आचरण में नहीं थी। पौराणिक काल में ही देवराज इंद्र का पद सबसे प्रतिष्ठित और प्रसिद्ध माना गया, लेकिन अपनी वासना और अहिल्या के साथ किए गए छल के कारण उनका व्यक्तिगत चरित्र सदैव कलंकित रहा। यह दिखाता है कि पद और ज्ञान कभी भी चरित्र की गारंटी नहीं होते।
यदि हम ऐतिहासिक गलियारों में झांकें, तो ऐसे कई प्रबुद्ध और शक्तिशाली नाम मिलते हैं जिनकी बौद्धिक क्षमता का लोहा पूरी दुनिया ने माना, लेकिन उनके व्यक्तिगत जीवन के निर्णय क्रूरता और दोहरेपन से भरे थे। उदाहरण के लिए, मुगल बादशाह औरंगज़ेब को एक बेहद पढ़ा-लिखा, धार्मिक और कुरान की आयतें लिखकर अपनी आजीविका चलाने वाले एक 'सादा जीवन' जीने वाले शासक के रूप में पेश किया गया। लेकिन जब बात सत्ता की भूख और व्यक्तिगत चरित्र की आई, तो उसने अपने सगे भाइयों की निर्मम हत्या कर दी और अपने बूढ़े पिता शाहजहाँ को ताउम्र कैद में तड़पने के लिए छोड़ दिया। इतिहास गवाह है कि दुनिया के बड़े-बड़े दार्शनिक और विचारक, जिन्होंने पन्नों पर तो इंसानियत और बराबरी के महान ग्रंथ लिखे, लेकिन जब उनके निजी जीवन को खंगाला गया तो वे अपने ही दासों, नौकरों और महिलाओं के शोषण में लिप्त पाए गए।
आज के राजनीतिक परिदृश्य में तो यह विरोधाभास हर रोज का तमाशा बन चुका है। चुनाव के समय मंचों से जो नेता लोकतंत्र, ईमानदारी, देशसेवा और भ्रष्टाचार-मुक्त समाज की कसमें खाते नहीं थकते, वे कैमरे के पीछे जाते ही अपने असली रंग में आ जाते हैं। इतिहास और वर्तमान ऐसी राजनीतिक हस्तियों से भरा पड़ा है जो दिन में सादगी का ढोंग करते हैं और रात के अंधेरे में अरबों के घोटालों, अपराधियों को संरक्षण देने और अनैतिक गतिविधियों में लिप्त पाए जाते हैं। कल तक जो नेता संसद में खड़े होकर शुचिता पर भाषण दे रहे होते हैं, अगले ही दिन वे किसी स्टिंग ऑपरेशन या जांच एजेंसी की रिपोर्ट में रंगे हाथों पकड़े जाते हैं। जनता जिन्हें अपना 'भाग्यविधाता' और आदर्श मानकर पूजती है, वे भीतर से केवल सत्ता और धन के भूखे भेड़िए साबित होते हैं।
आज की आधुनिक शिक्षा को देखकर ऐसा लगता है कि यह केवल डिग्री हासिल करने, ऊँचे पैकेज वाली नौकरी पाने और सामाजिक रसूख बनाने का जरिया बनकर रह गई है। आज का पढ़ा-लिखा इंसान बौद्धिक रूप से बहुत चालाक हो गया है। वह अपनी बुद्धि और तर्कों का उपयोग अक्सर अपने गलत कामों को सही ठहराने और उन्हें समाज से छिपाने के लिए करता है। विज्ञान और तकनीक ने हमारे दिमाग को तो बहुत विकसित कर दिया है, लेकिन शायद हमारे दिल को संवेदनशून्य बना दिया है। यही कारण है कि बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों से निकले उच्च शिक्षित लोग भी अपने व्यक्तिगत जीवन में लालच, अहंकार, और घरेलू हिंसा जैसे गंभीर विकारों से मुक्त नहीं हो पाते।
मुझे लगता है कि इस सामाजिक बीमारी का इलाज केवल किताबों या कड़े कानूनों में नहीं है। इसके लिए हमें अपनी बुनियादी सोच को बदलना होगा। सबसे पहले तो हमें साक्षर और शिक्षित के बीच का अंतर समझना होगा। जो केवल पढ़ना-लिखना और तर्क करना जानता है वह साक्षर हो सकता है, लेकिन जिसका चरित्र शुद्ध है, जो दूसरों के दुःख को समझता है, वही वास्तव में शिक्षित है। इसके साथ ही, हमें समाज में चल रही 'व्यक्ति-पूजा' के चलन को भी बंद करना होगा। किसी के अच्छे विचारों से प्रभावित होना एक बात है, लेकिन उसे अचूक मानकर उसकी अंधभक्ति में लीन हो जाना बिल्कुल दूसरी बात है।
अंततः, मेरा यही मानना है कि प्रसिद्धि और विद्वता का व्यक्तिगत चरित्र के विपरीत होना किसी भी जीवित समाज के पतन का स्पष्ट लक्षण है। यदि समाज का मार्गदर्शक और पढ़ा-लिखा वर्ग ही इस दोहरे चरित्र का शिकार हो जाएगा, तो आने वाली पीढ़ियाँ किस पर विश्वास करेंगी? समय आ गया है कि हम 'सफलता' और 'विद्वता' के पैमाने को बदलें। सफल और प्रसिद्ध केवल उसे न माना जाए जिसके पास धन, पद, सामाजिक रसूख या डिग्रियां हैं, बल्कि उसे माना जाए जिसका व्यक्तिगत जीवन और चरित्र निष्कलंक हो। क्योंकि अंततः, कोई भी समाज खोखले मुखौटों से नहीं, बल्कि वास्तविक और सच्चे चरित्रों से ही मजबूत बनता है।
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