Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

पिता

 

पिता — अनकहे संघर्ष और संस्कारों की मजबूत नींव

✍️ अमरेश सिंह भदौरिया

पिता... यह केवल एक शब्द नहीं है, बल्कि एक ऐसा अहसास और एक ऐसी मजबूत छाया है जो हमारे पूरे जीवन का आधार होती है। हम अक्सर देखते हैं कि मदर्स डे (मातृ दिवस) पर जितनी भावुकता, कविताएँ और सोशल मीडिया पर पोस्ट तैरते हुए दिखते हैं, फादर्स डे (पितृ दिवस) पर वैसा माहौल या शोर नहीं दिखाई देता। शायद ऐसा इसलिए है क्योंकि एक पिता का प्यार अक्सर खामोश होता है। वह बाहर से अनुशासन और कठोरता का मुखौटा भले ही ओढ़े रहें, लेकिन भीतर ही भीतर उनका प्यार किसी शांत नदी की तरह बहता है और हमारे जीवन को सींचता रहता है। सच कहूँ तो पितृ दिवस कैलेंडर की कोई तारीख भर नहीं है, बल्कि उस अनकहे, अनसुने संघर्ष को महसूस करने और उन्हें गले लगाने का एक अपनों वाला अवसर है।

एक पिता की पूरी जिंदगी त्याग और समर्पण की एक ऐसी कहानी है जिसे वो कभी किसी को सुनाते नहीं। वे अपनी इच्छाओं, अपनी खुशियों और यहाँ तक कि अपनी खुद की पहचान को भी परिवार की भलाई के लिए चुपचाप दांव पर लगा देते हैं। बचपन में हमें पिता का अनुशासन शायद बोझिल लगता है, उनकी रोक-टोक पर गुस्सा आता है, लेकिन जब हम खुद जिंदगी के मैदान में उतरते हैं और कंधों पर जिम्मेदारियाँ आती हैं, तब समझ आता है कि वह कठोरता दरअसल हमें जिंदगी की कड़ी धूप से बचाने के लिए एक साया थी। यह ठीक वैसे ही है जैसे एक मूर्तिकार पत्थर पर चोट करके उसे तराशता है; शुरुआत में वे चोटें बहुत दर्द देती हैं, लेकिन अंत में एक सुंदर मूरत बनकर सामने आती है। पिता भी हमारे व्यक्तित्व को कुछ इसी तरह गढ़ते हैं।

अगर हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में देखें, तो पिता एक मजबूत पुल की तरह हैं जो हमें हमारे परिवार की जड़ों, परंपराओं और अच्छे संस्कारों से जोड़कर रखते हैं। आज की युवा पीढ़ी को इस बात को गहराई से समझना होगा। पिता केवल पैसे कमाने वाली मशीन या परिवार की जरूरतें पूरी करने वाले माध्यम नहीं हैं, वे हमारे जीवन और राष्ट्र के निर्माण की पहली पाठशाला हैं। एक पिता जब अपने बच्चे को ईमानदारी, मेहनत और देशप्रेम का पाठ पढ़ाता है, तो वह अनजाने में ही समाज को एक अच्छा इंसान और देश को एक आदर्श नागरिक दे रहा होता है। उनका हमारे साथ होना ही एक ऐसी ढाल की तरह है, जो हमें बाहरी दुनिया के हर डर से बचाती है और हमारे भीतर यह भरोसा जगाए रखती है कि 'चाहे जो हो जाए, पीछे कोई खड़ा है।'

पिता का प्यार शब्दों का मोहताज नहीं होता, उसे उनकी हर छोटी-बड़ी आदत में महसूस किया जा सकता है। उनका प्यार सुबह की पहली किरण के साथ काम पर निकल जाने में है, देर रात थके-हारे घर लौटने में है, बच्चों की स्कूल फीस का इंतजाम करने में है, या अपनी फटी बनियान और घिसे हुए जूतों को नजरअंदाज करके बच्चों के लिए नए कपड़े लाने में है। हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि आज हमारे सिर पर जो सुरक्षित छत है, हमारी थाली में जो इज्जत का भोजन है, और समाज में सिर उठाकर चलने का जो हौसला है, वह उन्हीं के मौन बलिदानों की बुनियाद पर खड़ा है। माँ का प्रेम जहाँ हमें संवेदनशील और कोमल बनाता है, वहीं पिता का प्रेम हमें व्यावहारिक रूप से मजबूत बनाकर विपरीत परिस्थितियों से लड़ना सिखाता है। किसी भी अच्छे समाज और मजबूत देश के लिए इन दोनों ही सीखों का होना बेहद जरूरी है।

आज के इस दौर में, जब संयुक्त परिवार टूट रहे हैं और दो पीढ़ियों के बीच एक दूरी सी बनती जा रही है, यह दिन हमें ठहरकर सोचने पर मजबूर करता है। हमारी युवा पीढ़ी को यह बात समझनी होगी कि माता-पिता का सम्मान केवल साल में एक दिन सोशल मीडिया पर स्टेटस लगाने या उन्हें कोई तोहफा देने तक सीमित नहीं होना चाहिए। असली पितृ दिवस तो उस दिन सार्थक होगा जब हम उनके बुढ़ापे की लाठी बनेंगे, उनके अनुभवों का आदर करेंगे और उनके दिए हुए संस्कारों को अपने जीवन में उतारेंगे। जो समाज अपने बुजुर्गों और पिताओं के त्याग को भूल जाता है, वह अपनी जड़ों से कटकर कभी आगे नहीं बढ़ सकता।

आइए, इस मौके पर हम उन हाथों को याद करें जिन्होंने हमारी नन्हीं उंगली पकड़कर हमें चलना सिखाया, उन आँखों को नमन करें जिन्होंने हमारे सुनहरे भविष्य के सपने बुने। चाहे वे आज हमारे साथ इस दुनिया में हों या हमारी यादों में, उनके प्रति कृतज्ञ रहना ही हमारे जीवन का सबसे बड़ा धर्म है। यह दिन सिर्फ एक त्योहार मनाने का नहीं, बल्कि खुद के भीतर झांकने का है कि हम खुद आने वाली पीढ़ी के सामने कैसा उदाहरण रख रहे हैं। आइए, उस मजबूत स्तंभ को दिल से सलाम करें जिसने हमारे जीवन की इमारत को हमेशा संभाले रखा और हमें कभी टूटने नहीं दिया।




Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ