पश्चिम एशिया संकट और भारत
अमरेश सिंह भदौरिया
पश्चिम एशिया एक बार फिर तनाव के केंद्र में है। पिछले तीन सप्ताह से अधिक समय से जारी संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर बना दिया है। हर दिन नए हमले हो रहे हैं। हर दिन नई आशंकाएँ जन्म ले रही हैं। यह अब केवल सीमित भूभाग का विवाद नहीं रहा। इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था, कूटनीति और सामरिक संतुलन पर स्पष्ट दिखाई दे रहा है। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव तेज हुआ है। समुद्री व्यापारिक मार्गों पर खतरा बढ़ा है। यह संकेत हैं कि संकट सतही नहीं, बल्कि गहराई तक फैल रहा है।
इस संकट में अमेरिका की भूमिका सबसे अधिक सक्रिय और उतनी ही विवादास्पद है। वह स्वयं को शांति का समर्थक बताता है, लेकिन उसके निर्णय अक्सर उसके रणनीतिक हितों से संचालित होते हैं। इजराइल को उसका खुला समर्थन इस तथ्य को स्पष्ट करता है। पश्चिम एशिया में उसकी सैन्य उपस्थिति केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रभाव और नियंत्रण की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है। ऊर्जा स्रोतों और समुद्री मार्गों पर पकड़ बनाए रखना उसकी प्राथमिकता में है। यही कारण है कि उसकी नीतियाँ कई बार संतुलन की सीमा लांघती प्रतीत होती हैं।
रूस इस पूरे घटनाक्रम को एक अवसर के रूप में देख रहा है। वह प्रत्यक्ष टकराव से बचते हुए भी अपनी सक्रिय उपस्थिति बनाए रखता है। उसका लक्ष्य स्पष्ट है—अमेरिकी प्रभाव को सीमित करना और स्वयं को एक वैकल्पिक शक्ति के रूप में स्थापित करना। वह यह संकेत भी दे रहा है कि विश्व अब एकध्रुवीय नहीं रहा। उसकी बढ़ती सक्रियता बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन की ओर इशारा करती है।
ईरान, जिसकी राजधानी तेहरान है, इस संकट का एक केंद्रीय पात्र बन चुका है। वह प्रत्यक्ष युद्ध से बचते हुए भी अपनी रणनीतिक स्थिति को मजबूत कर रहा है। उसके प्रभाव वाले समूह क्षेत्र में सक्रिय हैं। इजराइल के साथ उसका तनाव पुराना है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में यह अधिक तीव्र और स्पष्ट हो गया है। ईरान की नीति अब रक्षात्मक नहीं, बल्कि प्रभाव विस्तार की दिशा में अग्रसर दिखाई देती है।
इजराइल इस समय अत्यंत आक्रामक रुख में है। वह अपनी सुरक्षा को सर्वोच्च मानता है। किसी भी खतरे का उत्तर वह तुरंत और निर्णायक रूप से देता है। उसकी सैन्य कार्रवाई लगातार जारी है। वह यह संदेश देना चाहता है कि उसकी संप्रभुता से कोई समझौता संभव नहीं है। किंतु इस संघर्ष की सबसे बड़ी कीमत आम नागरिक चुका रहे हैं। विस्थापन, भय और असुरक्षा—यही इस युद्ध का मानवीय चेहरा है।
इराक इस पूरे संकट में एक कमजोर कड़ी के रूप में उभरता है। वह पहले से ही आंतरिक अस्थिरता और बाहरी हस्तक्षेपों के प्रभाव से जूझ रहा है। वर्तमान तनाव उसकी स्थिति को और जटिल बना सकता है। यह स्थिति इस तथ्य की पुष्टि करती है कि बाहरी हस्तक्षेपों के प्रभाव अल्पकालिक नहीं, बल्कि दीर्घकालिक और गहरे होते हैं।
अब बात भारत की। भारत इस पूरे परिदृश्य को केवल देख नहीं रहा, बल्कि उसे गहराई से समझ रहा है। उसकी स्थिति संतुलन की है, किंतु यह संतुलन अब सक्रिय रणनीति में परिवर्तित होने की मांग कर रहा है। एक ओर उसके संबंध अमेरिका और इजराइल से हैं, तो दूसरी ओर ईरान और खाड़ी देशों से भी उसके मजबूत रिश्ते हैं। यही उसकी कूटनीतिक चुनौती है और यही उसकी वास्तविक शक्ति भी।
भारत की प्राथमिकताएँ स्पष्ट हैं—ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और वैश्विक स्थिरता में रचनात्मक योगदान। किंतु वर्तमान संकट यह संकेत दे रहा है कि केवल संतुलन बनाए रखना पर्याप्त नहीं है। अब दूरदर्शी, ठोस और समयबद्ध कदमों की आवश्यकता है।
सबसे पहला कदम ऊर्जा क्षेत्र में उठाना होगा। भारत को अपनी तेल निर्भरता को चरणबद्ध तरीके से कम करने की दिशा में गंभीर प्रयास करने होंगे। नवीकरणीय ऊर्जा, हरित प्रौद्योगिकी और वैकल्पिक स्रोतों में निवेश बढ़ाना अनिवार्य है। साथ ही, दीर्घकालिक और विविधीकृत ऊर्जा समझौते करने होंगे, ताकि अचानक उत्पन्न संकटों का प्रभाव सीमित किया जा सके। यह केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का आधार है।
दूसरा, भारत को अपनी कूटनीतिक भूमिका का विस्तार करना होगा। अब केवल तटस्थ रहना पर्याप्त नहीं है। भारत को संवाद का सक्रिय सेतु बनना होगा। ऐसे समय में जब कई देश प्रत्यक्ष वार्ता से बच रहे हैं, भारत एक विश्वसनीय मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है। यह उसकी वैश्विक साख को भी सुदृढ़ करेगा और उसके हितों की रक्षा भी करेगा।
तीसरा, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा के लिए एक सुदृढ़ और पूर्व-तैयार तंत्र विकसित करना होगा। केवल संकट के समय प्रतिक्रिया देना पर्याप्त नहीं है। सुरक्षित निकासी की योजनाएँ, डिजिटल ट्रैकिंग और स्थानीय समन्वय को पहले से व्यवस्थित करना आवश्यक है। यह मानवीय दायित्व के साथ-साथ रणनीतिक आवश्यकता भी है।
चौथा, भारत को अपने सामरिक संबंधों में संतुलन बनाए रखना होगा, किंतु यह संतुलन निष्क्रिय नहीं होना चाहिए। उसे प्रत्येक संबंध को अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप पुनर्परिभाषित करना होगा। किसी एक शक्ति पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में जोखिम उत्पन्न कर सकती है। इसलिए बहुस्तरीय और विविध संबंध ही उसकी वास्तविक शक्ति हैं।
पाँचवाँ, समुद्री सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। पश्चिम एशिया से आने वाले व्यापारिक मार्ग भारत की आर्थिक संरचना की धुरी हैं। यदि ये मार्ग बाधित होते हैं, तो इसका सीधा प्रभाव आपूर्ति श्रृंखला और आर्थिक स्थिरता पर पड़ेगा। इसलिए नौसैनिक क्षमता के विस्तार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सुदृढ़ करना समय की मांग है।
छठा, भारत को अपने रक्षा और खुफिया तंत्र को अधिक सक्षम, सक्रिय और तकनीकी रूप से उन्नत बनाना होगा। यह संकट केवल पारंपरिक युद्ध तक सीमित नहीं है। इसके प्रभाव साइबर क्षेत्र, आतंकी नेटवर्क और वैचारिक उग्रवाद तक फैल सकते हैं। इसलिए पूर्व तैयारी ही सबसे प्रभावी रणनीति है।
यह भी स्पष्ट है कि यह संघर्ष सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा। इसके प्रभाव दूरगामी होंगे। वैश्विक अर्थव्यवस्था, कूटनीतिक समीकरण और सामरिक गठबंधन—सभी प्रभावित होंगे। ऐसे में भारत के सामने केवल विकल्प नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक जिम्मेदारी खड़ी है। उसे यह तय करना होगा कि वह केवल संतुलन बनाए रखेगा या एक सक्रिय और प्रभावशाली भूमिका निभाएगा।
अंततः, यह समय केवल प्रतिक्रिया देने का नहीं, बल्कि भविष्य को भांपकर निर्णायक कदम उठाने का है। पश्चिम एशिया का यह संकट एक चेतावनी भी है और एक अवसर भी। यह भारत को अपनी नीतियों को और स्पष्ट, सुदृढ़ और दूरदर्शी बनाने का अवसर देता है। यदि भारत इस समय संतुलन, विवेक और सक्रियता के साथ आगे बढ़ता है, तो वह न केवल अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर सकता है, बल्कि वैश्विक मंच पर एक निर्णायक शक्ति के रूप में उभर सकता है।
भारत की रणनीतिक परिपक्वता वही है, जिसमें वह वर्तमान के संकट को समझते हुए ऐसे संतुलित, दूरदर्शी और सक्रिय निर्णय ले, जो तात्कालिक सुरक्षा के साथ-साथ दीर्घकालिक वैश्विक भूमिका को भी सुनिश्चित करें।
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