पांचाली
वो पांच पथों से आई थी
पांचाली बनकर,
पर हर राह ने
उसे कहीं न कहीं
चीर दिया था।
सभा में खड़ी थी वो—
आँखों में ज्वाला, पर हाथ खाली।
एक स्त्री अकेली,
और सत्ता पुरुषों के हाथ में
जिन्हें धर्म याद आया,
पर न्याय नहीं।
वो चुप रही,
क्योंकि उसे सिखाया गया था
कि "सीता की तरह सहना"
ही नारी का धर्म है।
पर भीतर—
एक अग्निकुंड लगातार धधकता रहा।
पांचाली अब राजमहल में नहीं,
वो बसों में, दफ़्तरों में, खेतों में,
स्कूलों और सोशल मीडिया में है।
जहाँ कोई उसकी हँसी छीनने आता है,
वो फिर खड़ी होती है—
ना रोती है,
ना गिड़गिड़ाती है।
वो अब खुद चीर बढ़ा सकती है,
या तान सकती है तलवार।
कृष्ण अब भीतर है—
उसकी आत्मा में
संकल्प बनकर।
©®अमरेश सिंह भदौरिया
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