पाजेब
जब वो चलती है
कच्ची पगडंडी पर,
तो मिट्टी की चूड़ी सी बज उठती है —
उसकी पाजेब।
न कोई बैंड, न बाजा,
पर जब खेतों के किनारे से
वो गुजरती है,
तो लगता है जैसे
सारी धरती उसकी ताल में थिरक रही हो।
पाजेब —
उसके बचपन की निशानी है,
जो माँ ने ब्याह के दिन पहनाई थी
कहते हुए:
"अब तेरे क़दमों की आवाज़
तेरे घर की पहचान होगी।"
वो जब थकी हुई चलती है,
तो पाजेब भी थक जाती है।
जब वो गुस्से में चलती है,
तो पाजेब झुंझलाती है।
और जब वो चुपचाप रोती है,
तो वही पाजेब
सबसे पहले उसकी बात समझती है।
पाजेब कोई गहना नहीं,
वो उसकी सखी है—
जो हर दुख-सुख में साथ चलती है।
जब प्रेमी उसे दूर से देखता है,
तो आँखों से पहले
उसके कान पहचानते हैं —
पाजेब की रुनझुन।
और जब वो एक दिन
नंगे पाँव चलती है—
तो घर, आँगन, गली
सब पूछते हैं:
"आज पाजेब क्यों नहीं बोली?"
क्योंकि पाजेब सिर्फ़ चलने की नहीं,
चुपचाप बोलने की चीज़ है।
और कभी-कभी
किसी स्त्री की सबसे गहरी आवाज़
उसके पाँवों से आती है।
©®अमरेश सिंह भदौरिया
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