पहला सावन
पहला सावन था उसका…
और पहली बार
उसने बिन पूछे भीगने की हिम्मत नहीं की।
पीहर की छतों से जो बूँदें
हँसते हुए नीचे उतरती थीं,
यहाँ…
ससुराल के आँगन में
वे संकोच में ठिठकी हुई लगती थीं।
नीम के नीचे खड़ी वो,
भीतर से गीली
पर बाहर से सधी हुई—
जैसे कोई नई बेल,
जो दीवार पकड़कर चढ़ना सीख रही हो।
उसकी आँखों में
राखी का धागा लहराता रहा,
भाई की छत,
माँ की चाय,
और बप्पा की वो पुकार—
“बरखा आई बिटिया, भीग मत जाना…”
अब वो खुद कहती है—
“भीग नहीं सकती,
घूँघट भारी हो जाएगा।”
साड़ी का रंग तो हरा था,
पर मन में सावन नहीं था…
केवल परछाइयाँ थीं—
रिवाज़ों की, परंपराओं की,
और उन आँखों की
जो हर मुस्कान को तौलती हैं।
रसोई में खड़खड़ाते बर्तन
और बाहर बूँदों की ताल—
उसका पहला संगीत था विवाह के बाद का।
और फिर…
एक बूँद
उसके खुले पाँव पर गिरी,
जैसे माँ का हाथ
धीरे से सहला गया हो—
वो ठिठकी,
नज़र उठाई,
और एक पल को
सावन को अपने भीतर आने दिया।
पहला सावन
उसके लिए
एक मौन संस्कार था—
जहाँ हँसी दबा ली जाती है,
पर मिट्टी पर एक नई जड़ जमती है।
©®अमरेश सिंह भदौरिया
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