Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

पड़ोसी धर्म

 

पड़ोसी धर्म

✍️ अमरेश सिंह भदौरिया

नदी अपने उद्गम से जब निकलती है, तो वह न अधिक जल लेकर चलती है, न कम। वह उतनी ही जलराशि समेटे बहती है जितनी उसके किनारों को संभाल सके, उन्हें साथ लेकर आगे बढ़ सके। यह उसकी सहजता है, उसका संतुलन है, उसका “पड़ोसी धर्म” है — जिसमें वह न अपने अस्तित्व को बढ़ा-चढ़ाकर थोपती है, न दूसरों के अस्तित्व को निगलने का प्रयास करती है।

लेकिन प्रकृति का एक अटल नियम है — परिवर्तन। यह परिवर्तन दो मार्गों से आता है —

पुरुषार्थ से, और

अनुदान से।

पुरुषार्थ से उत्पन्न परिवर्तन भीतर से आता है — धीरे-धीरे, संयमित रूप में। यह परिवर्तन स्थायी होता है, दीर्घजीवी होता है, और अपने साथ संतुलन, समरसता तथा सशक्तता का भाव लाता है। यह किसी नदी के उस बहाव जैसा है, जो शांति से बहता है, अपने किनारों को साथ लिए हुए, जीवन को पोषित करते हुए।

वहीं अनुदान द्वारा आया परिवर्तन अचानक आता है। यह बाहरी है, अस्थायी है, और इसके भीतर एक तरह की अराजकता छिपी होती है। इसका प्रभाव क्षणिक होते हुए भी गहरा होता है। नदी जब पावस ऋतु में बादलों से अनायास ही अधिक जलराशि पाती है, तो वह वही नदी, जो कल तक किनारों की संरक्षक थी, आज उन्हीं के लिए संकट बन जाती है। वह उफनती है, वेगवती हो जाती है। उसका संतुलन टूट जाता है। उसकी लहरें उन्मादी हो उठती हैं।

किनारे, जो कभी उसकी सहयात्रा में सहभागी थे, आज उसके आक्रोश के शिकार हो जाते हैं। यह दृश्य केवल प्रकृति का नहीं, समाज का भी दर्पण है।

जब किसी के पास बाहरी संसाधनों, सत्ता या अवसरों का अचानक और अत्यधिक “अनुदान” आ जाए, तो उसका व्यवहार, उसके संबंध, उसकी सीमाएँ—सब बदलने लगते हैं।
जो पहले साथ चलने वाला था, वही अपने पड़ोसियों के लिए असहनीय बन सकता है।

इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि संसाधन या शक्ति कितनी है —
प्रश्न यह है कि उस शक्ति को हम किस भाव से, किस विवेक से प्रयोग करते हैं?

पड़ोसी धर्म केवल एक सामाजिक नैतिकता नहीं, एक आंतरिक संतुलन की परीक्षा भी है।
सच्चा पड़ोसी वही होता है, जो अपनी उन्नति में दूसरों की सुरक्षा भी देखे, जो अपने प्रवाह में दूसरों के अस्तित्व की सीमा को पहचानता रहे।
नदी यदि सीमाएं तोड़े, तो वह बाढ़ बन जाती है।
और इंसान यदि विवेक खो दे, तो वह संबंधों का विनाश कर बैठता है।

निष्कर्ष:

सहअस्तित्व तभी संभव है जब हर शक्ति, हर परिवर्तन, और हर संबंध का आधार संयम और संतुलन हो।
नदी का शांत बहाव ही जीवनदायिनी है, उफान नहीं।
और पड़ोसी धर्म का सबसे बड़ा स्वरूप यही है —
अपने विस्तार में दूसरों के अस्तित्व की रक्षा करना।





Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ