नूतन वर्ष की पूर्व संध्या पर
शाम ढल रही है। आकाश में हल्की-सी लालिमा बची है, जैसे दिन जाते-जाते कुछ कहना चाहता हो। गाँव की पगडंडी पर धूल अब बैठ चुकी है, और हवा में एक अजीब-सी शांति घुल गई है। ऐसा लगता है, मानो प्रकृति भी किसी नए आरंभ की प्रतीक्षा में ठहर गई हो।
कल नया साल आएगा—विक्रम संवत 2083।
पर यह केवल तारीख बदलने की बात नहीं है।
हम लोग साल भर बहुत कुछ जोड़ते हैं—कुछ सुख, कुछ दुख, कुछ शिकायतें, कुछ अभिमान। धीरे-धीरे यह सब मन पर इतना जम जाता है कि भीतर की सहजता कहीं खो जाती है। शायद यही कारण है कि हर नया वर्ष हमें एक अवसर देता है—रुककर सोचने का, अपने भीतर झाँकने का।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा… यह नाम भले ही शास्त्रों में लिखा हो, पर इसका असली अर्थ तो खेतों में दिखता है, पेड़ों पर दिखता है। नई कोपलें जैसे चुपचाप कहती हैं—“पुराना बीत गया, अब फिर से जीने की कोशिश करो।”
हम भी तो ऐसा कर सकते हैं।
क्या जरूरी है कि हर बात का हिसाब रखा जाए?
क्या जरूरी है कि हर चोट को याद रखा जाए?
अगर इस बार कुछ बदलना है, तो शायद यही बदलना चाहिए—
मन थोड़ा हल्का हो, सोच थोड़ी व्यापक हो, और जीवन में केवल अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए भी कुछ करने की इच्छा जागे।
हमारे बुजुर्ग यूँ ही नहीं कहते थे—
"ममैतेन सङ्कल्पेन लोकानां हितमस्तु"
यानी, हमारे संकल्प में केवल अपना नहीं, सबका भला शामिल हो।
कल जब सूरज निकलेगा, तो वह हर साल की तरह ही निकलेगा।
पर फर्क इस बात से पड़ेगा कि हम उसे कैसे देखते हैं—
एक और साधारण दिन की तरह,
या एक नए अवसर की तरह।
इसी छोटी-सी आशा के साथ कि आने वाला वर्ष हमारे भीतर कुछ अच्छा जगा सके—
आप सभी को नव वर्ष की पूर्व संध्या पर सादर शुभकामनाएँ।
— अमरेश सिंह भदौरिया
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