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नीतिगत निरंतरता का बजट

 

नीतिगत निरंतरता का बजट

✍️अमरेश सिंह भदौरिया

कल 1 फरवरी 2026 को प्रस्तुत केंद्रीय बजट 2026–27 को यदि एक वाक्य में समेटा जाए, तो इसे आकांक्षाओं से अधिक निरंतरता का दस्तावेज कहा जा सकता है। सरकार ने इसे ‘विकसित भारत’ की दिशा में निर्णायक कदम बताया है, किंतु बजट के प्रावधानों को गहराई से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि यह किसी क्रांतिकारी छलाँग के बजाय एक नियंत्रित और सतर्क आर्थिक प्रयास है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक तनावों और घरेलू माँग की सीमाओं के बीच सरकार ने जोखिम उठाने के स्थान पर स्थिरता को प्राथमिकता दी है।

पूंजीगत व्यय को 12.2 लाख करोड़ रुपये तक पहुँचाना और सात नए तीव्रगामी रेल मार्गों की घोषणा यह संकेत देती है कि सरकार अब भी आधारभूत संरचना को आर्थिक विकास का प्रमुख आधार मान रही है। यह दृष्टिकोण दीर्घकालिक है और इसमें संदेह नहीं कि इससे आवागमन, परिवहन व्यवस्था और औद्योगिक गतिविधियों को गति मिलेगी। साथ ही, सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में राजकोषीय घाटे को 4.3 प्रतिशत तक सीमित रखने का प्रयास वित्तीय अनुशासन के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है, विशेषकर ऐसे समय में जब वैश्विक मंदी की आशंकाएँ बार-बार सामने आ रही हैं।

अर्धचालक मिशन के दूसरे चरण और जैव-औषधि क्षेत्र के लिए घोषित योजनाएँ यह स्पष्ट करती हैं कि भारत स्वयं को केवल उपभोक्ता बाज़ार तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि उच्च तकनीक आधारित विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में अग्रसर है। ये पहलें रणनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि भविष्य की अर्थव्यवस्था तकनीक, नवाचार और मूल्य संवर्धन पर आधारित होगी। मध्यम वर्ग के संदर्भ में सरकार ने कुछ राहतकारी कदम अवश्य उठाए हैं—जैसे विदेश यात्रा और चिकित्सा व्यय पर स्रोत पर कर संग्रह की दर में कटौती तथा कैंसर की दवाओं पर आयात शुल्क समाप्त करना—जो मानवीय संवेदना को दर्शाते हैं, हालाँकि इनसे आमदनी में प्रत्यक्ष वृद्धि का प्रभाव सीमित ही रहने वाला है।

फिर भी, बजट का आलोचनात्मक मूल्यांकन करते समय यह प्रश्न अनिवार्य हो जाता है कि क्या यह दस्तावेज़ देश की सबसे जटिल समस्याओं—विशेषकर बेरोजगारी और कृषि संकट—के लिए कोई ठोस दिशा प्रस्तुत करता है। बेरोजगारी के समाधान को लेकर कोई स्पष्ट और निर्णायक नीति उभरकर सामने नहीं आती। ग्रामीण रोजगार कार्यक्रमों के लिए किए गए प्रावधानों को लेकर भी अर्थशास्त्रियों के बीच असमंजस बना हुआ है। यह कमी इसलिए और अधिक उभरती है क्योंकि देश की एक बड़ी आबादी आज भी कृषि और असंगठित क्षेत्र पर निर्भर है।

शेयर बाज़ार के संदर्भ में वायदा और विकल्प सौदों पर लेन-देन कर में वृद्धि ने छोटे निवेशकों को निराश किया है। इसे अति-सट्टात्मक गतिविधियों पर नियंत्रण के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है, किंतु इसका तात्कालिक प्रभाव बाज़ार की धारणा पर प्रतिकूल पड़ा है। वहीं, नई कर व्यवस्था को प्रोत्साहित किए जाने के बावजूद व्यक्तिगत आयकर की दरों में कोई प्रत्यक्ष परिवर्तन न होना वेतनभोगी वर्ग की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर सका। बढ़ती महँगाई के बीच हाथ में आने वाली आय में वृद्धि की जो आशा थी, वह काफी हद तक अधूरी रह गई।

संघीय ढाँचे की दृष्टि से भी बजट पर प्रश्न उठे हैं। विपक्ष शासित राज्यों, विशेषकर पश्चिम बंगाल, ने विशेष परियोजनाओं के वितरण में क्षेत्रीय असंतुलन का आरोप लगाया है। यद्यपि संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार करों में राज्यों की हिस्सेदारी सुनिश्चित की गई है, फिर भी विकास योजनाओं के चयन और क्रियान्वयन को लेकर असंतोष की आवाज़ें यह संकेत देती हैं कि संघवाद की भावना को और अधिक सुदृढ़ करने की आवश्यकता है।

समग्र रूप से देखा जाए तो 53.5 लाख करोड़ रुपये के इस बजट को लोक-लुभावन घोषणाओं से अधिक नीतिगत निरंतरता का प्रयास कहा जा सकता है। यह बजट उत्पादन-केन्द्रित सोच तथा औद्योगिक और डिजिटल आधारभूत संरचना पर भरोसा जताता है, किंतु आम नागरिक की दैनिक चिंताओं—महँगाई, रोजगार और आय-वृद्धि—के समाधान की दिशा में यह अपेक्षाकृत संयमित दिखाई देता है। संभवतः सरकार ने तात्कालिक लोकप्रियता के बजाय दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता को प्राथमिकता दी है, पर आने वाले समय में यही संतुलन इसकी सबसे बड़ी परीक्षा भी बनेगा।




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