नागफनी
धूप में उगी नागफनी
जैसे किसी औरत की चुप्पी—
कम बोलती है,
पर हर काँटा
एक घाव की भाषा है।
ना गीत, ना गंध,
ना किसी ऋतु का आलिंगन—
फिर भी खड़ी है
रेत में जड़ जमाए
अपने ही अस्तित्व की
गवाही देती।
आँगन की चौखट लांघे बिना
वो सबकुछ जानती है—
किस किस ने क्या छीना,
कौन–कौन मुस्कराया
उसके आत्म-संयम पर।
उसके भीतर
फूलों की आकांक्षा मर चुकी है,
पर जीवन का ताप
अब भी बचा है—
वो सिर्फ़ एक देह नहीं,
संघर्षों की पाठशाला है।
वो खेत नहीं
जिसे हल जोता जाए,
वो जंगल नहीं
जिसे काटा जाए,
वो नागफनी है—
जिसे न रोपा गया,
न माँगा गया,
पर उग आई
अपने होने की जिद पर।
जिसे छूने से
लोग बचते हैं,
क्योंकि उसके पास
आराम नहीं—
सिर्फ़ सवाल हैं।
©®अमरेश सिंह भदौरिया
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