मौन का अपराध
अमरेश सिंह भदौरिया
तटस्थता कोई विवेक नहीं,
चेतना की सुसुप्त अवस्था का नाम है।
जब काल के किसी खंड में
सत्य और असत्य आमने-सामने हों,
तब शून्य में खड़े रहने की चेष्टा सज्जनता नहीं,
आत्मा का स्व-रचित भ्रम है।
तराज़ू के दोनों पलड़ों को
समकोण पर देखना न्याय का दर्शन नहीं—
जब एक ओर जड़ अहंकार का भार हो,
और दूसरी ओर चेतना का स्पंदन।
इतिहास की गति साक्षी है,
सत्य कभी संख्या का दास नहीं रहा।
उसे न नारों की संकीर्णता चाहिए,
न किसी विचार का आवरण।
सत्य स्वयं सिद्ध है,
जैसे अंबर में सूर्य का अस्तित्व—
जिसे सिद्ध करने के लिए तर्क की
किसी टिमटिमाती लौ की आवश्यकता नहीं होती।
प्रकाश और अंधकार के मध्य
कोई 'संधि-स्थल' नहीं होता।
बीच के धुंधलके में विराम लेने वाले
अक्सर अपनी ही परछाईं को सत्य समझ बैठते हैं।
यदि नियति तुम्हें निर्णय के मोड़ पर ला खड़ा करे,
तो सुविधा के क्षणिक विश्राम को नकार कर
कंटकाकीर्ण आत्म-पथ को चुनना।
क्योंकि
समय का अनवरत पहिया जब घूमेगा,
तब विचारधाराएँ लुप्त हो चुकी होंगी,
सत्ता के आभामंडल धुंधला जाएँगे,
और भीड़ का कोलाहल महा-सन्नाटे में विलीन हो जाएगा।
तब भी काल के कपाल पर
केवल वही रेखा अंकित रहेगी—
जो करुणा, न्याय और शुद्ध चेतना के पक्ष में
अकेली ही सही, पर अडिग खड़ी थी।
सत्य कोई व्यवस्था या मत नहीं,
सत्य तो अंतरात्मा का अंतिम धर्म है;
और उसी धर्म के पक्ष में स्वयं को समर्पित कर देना—
निष्पक्ष होने की एकमात्र दार्शनिक नियति है।
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