मनिहारिन
आती है हर तीसरे चौथे दिन,
टोकरी में रंग-बिरंगी चूड़ियाँ लिए—
लाल, हरी, पीली, नीली...
जैसे मौसम की सारी भाषा
उसकी हथेली में सजी हो।
"चूड़ियाँ लो बहना..."
उसकी आवाज़ में कोई साधारण पुकार नहीं होती,
वो मानो हर स्त्री के मन की
कोई भूली हुई धुन छेड़ देती है।
वो जानती है
कौन-सी लड़की की सगाई तय हो चुकी है,
कौन विधवा है,
कौन रूठी हुई है,
और किसके हाथों में हरी चूड़ियाँ
अब शोभा नहीं देतीं।
वो चूड़ियाँ नहीं बेचती,
वो यादें पहनाती है।
उसके पास ना कोई मोबाइल है,
ना ही व्हाट्सएप,
पर गाँव की हर स्त्री की
खबर उसी के पास होती है।
वो हँसती है सबके साथ,
पर खुद की कहानी
कभी नहीं सुनाती।
शायद उसकी टोकरी में
उसके हिस्से की चूड़ियाँ
अब नहीं बचीं...
वो मनिहारिन
सिर्फ़ बाज़ार की महिला नहीं,
वो एक चलता-फिरता
स्त्री-संवेदना का संग्रहालय है।
©®अमरेश सिंह भदौरिया
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