मन मरुस्थल
भीतर कहीं
एक मरुस्थल है—
जहाँ
ना कोई हरियाली उगती है,
ना बादल रुकते हैं
भावनाओं के आकाश में।
प्यास केवल जल की नहीं होती,
कभी-कभी
एक स्पर्श,
एक संवाद,
एक साँस की साझेदारी
भी जीवन दे सकती है।
पर यहाँ—
हर रिश्ते ने
रेत के कणों-सा
छल किया है,
हर स्मृति
रेत के तूफ़ान-सी
आँखें भर देती है।
मन खोजता है
कोई नख़लिस्तान—
जहाँ विश्राम हो,
जहाँ कोई
थोड़ा-सा समझ सके
इस सूखेपन को।
किंतु मरुस्थलों में
पाँव के निशान भी
जल्द मिट जाते हैं,
और मन—
फिर से अकेला
अपनी ही गूंज में
भटकता है।
©®अमरेश सिंह भदौरिया
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