लघुकथा – महंगी शादी
अमरेश सिंह भदौरिया
मास्टर शिवप्रसाद की ज़िंदगी भर की कमाई आज बेटी की शादी में दांव पर लगी थी।
घर के आँगन में सजी रंग-बिरंगी लाइटें, मंडप में बैठे पंडित, और हाथ में चेकबुक लिए मास्टर साहब —
सब कुछ कुछ खोखला-सा लग रहा था।
लड़के वालों की माँगें दिन-ब-दिन बढ़ती गईं।
"गहने हल्के हैं... फ्रिज छोटा है... कार पुरानी है..."
और मास्टर साहब हर बार सिर्फ यही कहते,
"कोशिश कर रहा हूँ... बेटी की शादी है… कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।"
उस रात बेटी ने धीरे से उनके पास आकर कहा —
"पापा, आप थक गए हैं न?
कभी-कभी सोचती हूँ, क्या मेरी शादी आपका सपना थी... या आपकी सबसे बड़ी चिंता?"
मास्टर साहब ने बेटी की आँखों में देखा।
फिर अपनी आँखें पोंछते हुए बोले,
"बेटी, तू तो मेरी रौशनी है,
पर समाज ने शादी को इतना महँगा बना दिया है कि आज एक बाप अपनी रौशनी को विदा नहीं,
खुद को अंधेरे में धकेल कर भेज रहा है…"
दूसरे दिन सबने देखा —
विदा हुई दुल्हन के पीछे खड़ा एक बूढ़ा पिता,
जिसके माथे की शिकन में बेटी की मुस्कान छुपी थी…
और जेब में एक मुड़ा-तुड़ा कर्ज़ का काग़ज़,
जिस पर लिखा था —
"इज़्ज़त के नाम पर बिकता रहा प्यार… और एक बाप की कमाई।"
निष्कर्ष —
जब तक शादियाँ प्रेम और सरलता की बजाय
दिखावे और दहेज की मंडियों में सजती रहेंगी,
तब तक हर पिता
अपनी बेटी को विदा नहीं करेगा—
बल्कि अपने सपनों, अपने सम्मान
और अपने जीवन की सबसे सुंदर पूँजी को
धीरे-धीरे गिरवी रखता जाएगा।
और हर बेटी—
जो माँ-बाप की आँखों का तारा थी,
उसकी मुस्कान उस दिन सबसे फीकी होगी,
जिस दिन वह सबसे अधिक सजी होगी…
विवाह का वह क्षण,
जो एक पावन परिणय होना चाहिए था,
वह पिता की आँखों में
एक बोझिल ऋणपत्र बनकर झिलमिलाएगा…
जब तक समाज
शादी को एक उत्सव नहीं,
एक प्रतिस्पर्धा मानता रहेगा—
तब तक बेटियाँ विदा नहीं होंगी,
बल्कि हर बार एक पिता का हृदय
कहीं भीतर से
टूटता और चुपचाप मरता रहेगा…
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