Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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महकती सुबह

 

महकती सुबह

सबसे पहले जागता है
मुर्गे की बांग में लिपटा समय,
फिर धीरे-धीरे
मिट्टी की खुशबू में खुलती हैं आँखें—
बिल्कुल वैसे
जैसे माँ की गोद से उठता है बच्चा।

गाय की रँभाहट,
दूध की बाल्टी में पड़ती धार की आवाज़,
और तुलसी पर पड़ती पहली धूप—
ये सब मिलकर
गाँव की सुबह को
महका देते हैं जैसे
किसी गीत का पहला स्वर।

ओस से भीगी पगडंडियाँ,
हल्की धूल में लिपटे पैर,
और खेतों की हरियाली में
छुपे अनगिनत सपने—
हर चीज़
बिना बोले कह देती है:
"नया दिन है, कुछ भी हो सकता है।"

दादी तुलसी को जल देती हैं,
माँ आँगन बुहारती है,
और पिता
हल को सीधा करते हुए
आकाश की ओर देख
कोई मौन प्रार्थना करते हैं।

और तभी

पूरब से आती है वो रोशनी—
जो सिर्फ़ उजाला नहीं लाती,
बल्कि जीवन को
फिर से सार्थक बना देती है।

महकती सुबह
सिर्फ़ एक समय नहीं होती,
वो एक संवेदना होती है,
जो कहती है—
"चलो फिर से जी लें,
जैसे आज पहली बार जिएँ।"

©®अमरेश सिंह भदौरिया

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