लोक-मानस की अक्षय निधि हैं हमारी लोकोक्तियाँ
अमरेश सिंह भदौरिया
जब भी मैं भाषा के स्वरूप और उसकी जीवंतता पर विचार करता हूँ, तो बार-बार यह अनुभव करता हूँ कि किसी समाज की वास्तविक पहचान उसकी शब्दावली से अधिक उसकी लोकोक्तियों में सुरक्षित रहती है। भाषा यदि देह है, तो लोकोक्तियाँ उसकी चेतना हैं। ये शब्दों की सजावट भर नहीं, बल्कि पीढ़ियों के जीवनानुभव से उपजा वह सत्य हैं, जिसे हमारे पूर्वजों ने अपने श्रम, संघर्ष, विवेक और संवेदना के साथ अर्जित किया। समय के साथ जब संवाद की गति तेज़ हुई है और अभिव्यक्ति संक्षिप्त होती चली गई है, तब मुझे लगता है कि लोकोक्तियाँ हमें ठहरकर सोचने की संस्कृति से जोड़ती हैं।
लोकोक्तियों का जन्म मैंने कभी किसी पुस्तक के पन्नों में नहीं, बल्कि जीवन की खुली पाठशाला में होते देखा है। खेतों में काम करते किसान, चौपालों में बैठे बुज़ुर्ग, घर-गृहस्थी संभालती स्त्रियाँ—इन सबके अनुभवों से ही लोकोक्तियाँ आकार लेती हैं। जब कोई कहता है—“उत्तम खेती मध्यम बान, निषिद्ध चाकरी भीख निदान”—तो यह केवल आजीविका का वर्गीकरण नहीं होता, बल्कि आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान का एक मौन घोष होता है। ऐसी लोकोक्तियाँ हमें बताती हैं कि जीवन के गूढ़ सिद्धांत किसी ग्रंथ से पहले लोक में जन्म लेते हैं।
मुझे अक्सर लगता है कि लोकोक्तियाँ अनुभव की उस टकसाल से निकली हुई हैं, जहाँ जीवन स्वयं सिक्के ढालता है। इनमें वह सामर्थ्य है कि ये विस्तृत विचारों को एक पंक्ति में समेट देती हैं। “दूर के ढोल सुहावने” सुनते ही मनुष्य की वह प्रवृत्ति सामने आ जाती है, जिसमें वह दूर की चमक में अपना वर्तमान भूल जाता है। इसी तरह “नाच न जाने आँगन टेढ़ा” आत्ममंथन के अभाव पर सीधा प्रहार करती है। ऐसी सूक्तियाँ न केवल जीवन को समझाती हैं, बल्कि हमें अपने व्यवहार पर भी पुनर्विचार के लिए बाध्य करती हैं।
लोक-मानस ने समाज की विसंगतियों को उजागर करने के लिए भी लोकोक्तियों को अपना माध्यम बनाया है। सत्ता का दोगलापन हो या व्यवस्था की अराजकता—इन सब पर लोक ने खुलकर टिप्पणी की है। “हाथी के दाँत दिखाने के और, खाने के और” सुनते ही आज की राजनीति और सामाजिक दिखावे की तस्वीर उभर आती है। “अंधेर नगरी चौपट राजा” आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती है, जितनी अपने समय में रही होगी। इन कहावतों में जो व्यंग्य और कटाक्ष है, वह किसी लंबे भाषण से अधिक असरदार प्रतीत होता है।
लोकोक्तियाँ मुझे हमारी सांस्कृतिक स्मृति की तरह लगती हैं। इनमें लोक-कलाओं, त्योहारों, खान-पान और ग्रामीण जीवन की सहज गंध बसी हुई है। जब हम कहते हैं—“अपनी गली में कुत्ता भी शेर होता है”—तो यह केवल आत्मश्लाघा नहीं, बल्कि अपने परिवेश के प्रति स्वाभाविक आत्मविश्वास की अभिव्यक्ति है। यही लोकोक्तियाँ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मूल्यों और संस्कारों को मौखिक परंपरा के माध्यम से पहुँचाती हैं। यह इतिहास काग़ज़ों पर नहीं, बल्कि लोगों की स्मृति में सुरक्षित रहता है।
आज के डिजिटल युग में, जब संवाद इमोजी और संक्षिप्त संदेशों तक सिमटता जा रहा है, मुझे यह चिंता बार-बार सताती है कि कहीं हम अपनी इस भाषाई धरोहर से कट न जाएँ। लोकोक्तियों का कम होता प्रयोग केवल भाषा की हानि नहीं है, बल्कि सामूहिक अनुभव के क्षरण का संकेत भी है। जब एक लोकोक्ति विस्मृत होती है, तो उसके साथ जीवन को देखने का एक दृष्टिकोण भी खो जाता है।
इसलिए यह आवश्यक है कि हम लोकोक्तियों को केवल बुज़ुर्गों की बातचीत या लोक-कथाओं तक सीमित न रखें। इन्हें शिक्षा, साहित्य और आधुनिक संवाद का जीवंत हिस्सा बनाएँ। मेरे लिए लोकोक्तियाँ लोक-जीवन का वह दर्पण हैं, जिसमें हमारा अतीत बोलता है और वर्तमान को दिशा देता है। यदि हमें अपनी भाषा की आत्मा और समाज की संवेदनशीलता को सुरक्षित रखना है, तो इन लोक-रत्नों को सहेजना और आगे बढ़ाना हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है।
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