लक्ष्मण रेखा
वो खींच दी जाती है—
बिना पूछे, बिना कहे।
दरवाज़ों के चौखट पर नहीं,
बल्कि मन और सपनों के बीच।
कभी कहा जाता है—
"ये तेरी सुरक्षा है,"
कभी— "मर्यादा,"
पर असल में वो
डर और नियंत्रण का एक और नाम है।
राम जंगल जा सकते हैं,
लक्ष्मण साथ हो सकते हैं,
पर सीता के लिए रेखा है—
जिसे लांघना ‘पाप’ कहलाता है।
कोई नहीं पूछता,
कि अगर रावण रेखा के पार खड़ा है,
तो क्या चुपचाप खड़े रहना धर्म है?
या आवाज़ उठाना अधर्म?
आज भी खींची जाती हैं रेखाएँ—
दुपट्टे की लंबाई में,
ऑफिस की टेबल पर,
रात के समय और स्त्री की हँसी में।
पर अब सीता मौन नहीं है—
वो रेखा देखती है,
और सवाल करती है—
"जो मर्यादा मुझे बाँधती है,
क्या वही तुम्हारे लिए भी है?"
अब वो रेखा मिटाई जा रही है—
धीरे-धीरे, कदम दर कदम—
जहाँ स्त्री
सिर्फ़ भीतर की नहीं,
दुनिया की रानी बन रही है।
©®अमरेश सिंह भदौरिया
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY