क्या योग्यताएँ कर्म से पैदा होती हैं? जन्म से हर व्यक्ति शून्य होता है
“योग्यताएँ कर्म से पैदा होती हैं और जन्म से हर व्यक्ति शून्य होता है।” यह वाक्य सुनने में बहुत प्रभावशाली लगता है। पहली बार सुनने पर ऐसा लगता है कि इसमें जीवन का एक बड़ा सत्य छिपा हुआ है। आखिर कोई भी व्यक्ति जन्म लेते ही विद्वान, वैज्ञानिक, कलाकार या सफल व्यक्ति नहीं होता। उसे सीखना पड़ता है, मेहनत करनी पड़ती है और अपने जीवन में लगातार प्रयास करना पड़ता है। इसी कारण मुझे भी इस विचार में काफी सच्चाई दिखाई देती है। लेकिन जब इस बात पर थोड़ा गहराई से विचार करता हूँ, तो लगता है कि “जन्म से हर व्यक्ति शून्य होता है” कहना पूरी तरह सही नहीं है।
हम अपने आसपास के जीवन में ही इसके कई उदाहरण देख सकते हैं। एक ही परिवार में जन्मे और लगभग एक जैसे वातावरण में पले-बढ़े दो बच्चों की रुचियाँ अक्सर बिल्कुल अलग होती हैं। किसी को पढ़ाई में विशेष रुचि होती है, कोई खेल में अच्छा होता है, किसी को संगीत पसंद होता है और कोई चीजों को खोलकर उनके बारे में जानने में अधिक रुचि रखता है। बचपन में ही बच्चों के स्वभाव और रुचियों में कुछ अंतर दिखाई देने लगता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मनुष्य जन्म के समय पूरी तरह एक जैसा नहीं होता।
लेकिन दूसरी ओर, केवल किसी रुचि या क्षमता का होना भी पर्याप्त नहीं है। मैंने अपने विद्यार्थी जीवन में कई ऐसे विद्यार्थियों को देखा है जो शुरू से ही बहुत तेज माने जाते थे। उन्हें विषय जल्दी समझ में आ जाता था और वे दूसरों से आगे दिखाई देते थे। वहीं कुछ विद्यार्थी ऐसे भी थे जिन्हें किसी विषय को समझने में अधिक समय लगता था। लेकिन समय बीतने पर कई बार परिणाम बदल जाते थे। जो विद्यार्थी शुरू में बहुत तेज दिखाई देता था, वह मेहनत में पीछे रह जाता था, जबकि सामान्य समझ वाला विद्यार्थी नियमित पढ़ाई और लगातार अभ्यास के कारण आगे निकल जाता था।
इस अनुभव से मुझे यह समझ में आया कि प्रारंभिक क्षमता और अंतिम योग्यता एक ही बात नहीं होती। किसी व्यक्ति में प्रतिभा हो सकती है, लेकिन प्रतिभा का विकास अपने आप नहीं होता। उसके लिए अभ्यास, अनुशासन और निरंतर प्रयास की आवश्यकता होती है। संगीत की अच्छी समझ रखने वाला व्यक्ति बिना अभ्यास के अच्छा संगीतकार नहीं बन सकता। किसी विद्यार्थी की स्मरणशक्ति अच्छी हो सकती है, लेकिन पढ़ाई के बिना वह ज्ञानवान नहीं बन सकता। इसी तरह किसी खिलाड़ी में शारीरिक क्षमता हो सकती है, लेकिन प्रशिक्षण और मेहनत के बिना वह सफल खिलाड़ी नहीं बन पाएगा।
इस अर्थ में कर्म का महत्व बहुत बड़ा है। मेरे विचार से कर्म केवल काम करने का नाम नहीं है। इसमें मेहनत, अभ्यास, सीखने की इच्छा, अनुशासन और असफल होने के बाद फिर से प्रयास करने की क्षमता भी शामिल है। कई बार हम किसी सफल व्यक्ति को देखकर केवल उसकी सफलता देखते हैं, लेकिन उसके पीछे किए गए वर्षों के अभ्यास और संघर्ष को नहीं देख पाते। बाहर से किसी व्यक्ति की सफलता अचानक दिखाई दे सकती है, लेकिन वास्तव में उसके पीछे लंबे समय तक किया गया कर्म छिपा होता है।
फिर भी, यह कहना कि योग्यताएँ केवल कर्म से ही पैदा होती हैं, पूरी तरह सही नहीं होगा। व्यक्ति की जन्मजात क्षमताओं का भी कुछ महत्व होता है। हर व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक संरचना एक जैसी नहीं होती। किसी की स्मरणशक्ति तेज हो सकती है, किसी में कल्पनाशक्ति अधिक हो सकती है और किसी में चीजों को समझने की विशेष क्षमता हो सकती है। इन प्रारंभिक क्षमताओं को पूरी तरह नकारना भी सही नहीं है।
लेकिन जन्मजात क्षमता को मैं योग्यता का अंतिम रूप नहीं मानता। मेरे विचार से वह केवल एक संभावना होती है। किसी बच्चे में संगीत की अच्छी समझ हो सकती है, लेकिन उसे संगीतकार बनने के लिए सीखना और अभ्यास करना ही पड़ेगा। किसी बच्चे में गणित को जल्दी समझने की क्षमता हो सकती है, लेकिन वह पढ़ाई के बिना गणितज्ञ नहीं बन सकता। इसलिए प्रतिभा शुरुआत में मदद कर सकती है, लेकिन उसे वास्तविक योग्यता में बदलने का काम कर्म ही करता है।
इस बात को मैं एक बीज के उदाहरण से बेहतर समझता हूँ। बीज अपने आप में वृक्ष नहीं होता, लेकिन उसमें वृक्ष बनने की संभावना होती है। उसके लिए मिट्टी, पानी, प्रकाश और अनुकूल वातावरण की आवश्यकता होती है। साथ ही, उसका धीरे-धीरे विकसित होना भी जरूरी है। मनुष्य भी कुछ इसी तरह है। जन्म के समय उसके भीतर कुछ संभावनाएँ हो सकती हैं। परिवार और समाज उसे वातावरण देते हैं, शिक्षा उसे दिशा देती है और उसके अपने कर्म उसकी क्षमताओं को विकसित करते हैं।
यहाँ परिस्थितियों का महत्व भी कम नहीं है। हम अक्सर कहते हैं कि जो व्यक्ति मेहनत करता है, वह सफल होता है। इसमें काफी सच्चाई है, लेकिन जीवन को केवल इस एक वाक्य से नहीं समझा जा सकता। हर व्यक्ति को समान अवसर नहीं मिलते। कुछ बच्चों को अच्छी शिक्षा, किताबें, तकनीक और परिवार का सहयोग मिलता है। दूसरी ओर, कुछ बच्चे ऐसे वातावरण में बड़े होते हैं जहाँ पढ़ाई करना भी एक संघर्ष होता है।
हमारे आसपास ऐसे बहुत से बच्चे दिखाई देते हैं जिनमें प्रतिभा होती है, लेकिन उन्हें सही अवसर नहीं मिल पाता। कभी आर्थिक समस्या उनके रास्ते में आती है, कभी परिवार की जिम्मेदारियाँ और कभी सही मार्गदर्शन का अभाव। इसलिए किसी व्यक्ति की सफलता या असफलता को केवल उसके कर्मों का परिणाम मान लेना भी सही नहीं है। कर्म महत्वपूर्ण है, लेकिन कर्म करने की परिस्थितियाँ सभी के लिए समान नहीं होतीं।
इसके बावजूद, परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, कर्म की भूमिका समाप्त नहीं हो जाती। वास्तव में, मनुष्य के हाथ में सबसे महत्वपूर्ण चीजों में से एक उसका प्रयास ही है। हो सकता है कि सभी लोगों की शुरुआत एक जैसी न हो, लेकिन अपनी परिस्थितियों के भीतर जितना संभव हो, उतना आगे बढ़ने का प्रयास व्यक्ति स्वयं कर सकता है। किसी व्यक्ति को अपनी मंजिल तक पहुँचने में कम कठिनाइयाँ आती हैं और किसी को अधिक, लेकिन दोनों के संघर्ष को एक ही पैमाने से नहीं मापा जा सकता।
मुझे लगता है कि “जन्म से हर व्यक्ति शून्य होता है” इस वाक्य में सबसे अधिक विचार करने योग्य शब्द “शून्य” है। शून्य का अर्थ है—कुछ भी नहीं। लेकिन एक बच्चा कुछ भी नहीं लेकर जन्म नहीं लेता। वह ज्ञान लेकर नहीं आता, यह सही है; लेकिन उसमें सीखने की क्षमता होती है। वह जन्म लेते ही किसी विशेष क्षेत्र का विशेषज्ञ नहीं होता, लेकिन उसमें कई क्षेत्रों में विकसित होने की संभावना होती है। इसलिए मेरे लिए मनुष्य जन्म से शून्य नहीं, बल्कि संभावनाओं से भरा हुआ होता है।
यही बात कर्म को भी महत्वपूर्ण बनाती है। यदि मनुष्य में कोई संभावना है, तो उसे विकसित करने के लिए प्रयास आवश्यक है। केवल यह कह देना कि मेरे अंदर प्रतिभा है, पर्याप्त नहीं है। प्रतिभा तभी सार्थक होती है जब वह अभ्यास और कर्म से जुड़ती है। कई बार कम प्रतिभाशाली दिखाई देने वाला व्यक्ति लगातार मेहनत करके उस व्यक्ति से आगे निकल जाता है जो अपनी प्रतिभा पर ही निर्भर रहता है।
इसीलिए मुझे लगता है कि कर्मवाद का महत्व बहुत अधिक है। यह व्यक्ति को भाग्य के भरोसे बैठने से रोकता है। यदि हम यह मान लें कि हमारी पूरी योग्यता जन्म से ही तय हो चुकी है, तो प्रयास करने का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। लेकिन यदि हम यह मानते हैं कि हम सीख सकते हैं, बदल सकते हैं और अपने भीतर सुधार ला सकते हैं, तो जीवन में आगे बढ़ने की संभावना बनी रहती है।
हाँ, इसका अर्थ यह भी नहीं है कि हर सफलता केवल मेहनत से मिलती है और हर असफलता व्यक्ति की अपनी गलती होती है। जीवन में अवसर, परिवार, आर्थिक स्थिति, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक परिस्थितियाँ भी अपना प्रभाव डालती हैं। दो लोग समान मेहनत कर सकते हैं, लेकिन उनके परिणाम अलग हो सकते हैं, क्योंकि उनके अवसर और परिस्थितियाँ अलग हो सकती हैं। इस वास्तविकता को स्वीकार करना भी उतना ही जरूरी है जितना कर्म के महत्व को स्वीकार करना।
इस पूरे विचार पर सोचने के बाद मुझे लगता है कि मनुष्य को न तो जन्म से पूरी तरह शून्य कहा जा सकता है और न ही जन्म से पूरी तरह योग्य। वह कुछ संभावनाओं के साथ जीवन में आता है। इन संभावनाओं का विकास उसके वातावरण, शिक्षा, अनुभव और कर्मों से होता है।
इसलिए मेरे विचार से यह कहना अधिक उचित होगा कि मनुष्य जन्म से शून्य नहीं, बल्कि संभावनाओं का एक प्रारंभिक रूप होता है। उसकी योग्यताएँ उसके कर्म, अभ्यास, शिक्षा और अनुभवों के माध्यम से विकसित होती हैं।
हम यह तय नहीं करते कि हमारा जन्म कहाँ और किन परिस्थितियों में होगा। हम यह भी तय नहीं करते कि हमारा परिवार कैसा होगा या हमें जीवन की शुरुआत में कितने अवसर मिलेंगे। लेकिन अपने भीतर मौजूद क्षमताओं के साथ हम क्या करते हैं, इसमें हमारी भूमिका अवश्य होती है। कोई व्यक्ति अपनी सीमाओं के बावजूद आगे बढ़ने का प्रयास कर सकता है और कोई व्यक्ति बहुत अधिक सुविधाएँ मिलने के बाद भी प्रयास न करने के कारण पीछे रह सकता है।
अंततः मैं यही मानता हूँ कि जन्म हमारे जीवन की शुरुआत है, हमारी पूरी पहचान नहीं। जन्म हमें कुछ संभावनाएँ दे सकता है, परिस्थितियाँ हमें अवसर या कठिनाइयाँ दे सकती हैं, लेकिन हमारे कर्म ही यह तय करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं कि हम उन संभावनाओं का कितना विकास कर पाते हैं।
इसलिए “योग्यताएँ कर्म से पैदा होती हैं, जन्म से हर व्यक्ति शून्य होता है” यह कथन पूरी तरह सही नहीं है, लेकिन इसमें एक गहरा सत्य अवश्य है। मनुष्य जन्म से पूरी तरह शून्य नहीं होता; वह संभावनाओं से भरा होता है। उन संभावनाओं को वास्तविक योग्यता में बदलने के लिए कर्म आवश्यक है। शायद जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि हम कहाँ से शुरू करते हैं, यह हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन वहाँ से आगे बढ़ने के लिए हम कितना प्रयास करते हैं, इसमें हमारा अपना योगदान अवश्य होता है।
अमरेश सिंह भदौरिया
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