Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

कनेर

 

कनेर

वो गुलाब नहीं,
जो इत्र बन जाए,
ना कमल,
जो पूजा की थाली में सजे—
वो कनेर है…
धूप सहता, अकेला खिलता,
बिना माँग के रंग बिखेरता।

कोई नमी नहीं ज़मीन में,
ना पास कोई झरना,
पर फिर भी
हर गर्मी में
वो अपनी शाखों से
रंग निकाल ही लाता है।

जैसे कोई पुरुष,
जो हर संकट में
अपनी हँसी से घर को थाम लेता है।

उसके पत्ते
ना नर्म हैं,
ना चिकने—
वे तो जैसे
जिम्मेदारियों के मोटे पंजे हैं,
जो हर आँधी को झेलते हुए
जड़ों से कह देते हैं—
"मत हिलना।"

बच्चे उसे फूल नहीं मानते,
क्योंकि उसमें गंध नहीं,
पर उन्हें नहीं पता—
वो जो पिता दरवाज़े पर
धूप में खड़ा है,
वही घर की छाँव है।

कनेर कभी शिकायत नहीं करता,
क्योंकि उसने आदत डाल ली है—
दीवार से टिककर
भीतर खिले रहने की।

वो कभी दीवार की दरार में उग आता है,
तो कभी रेल की पटरी के पास—
जैसे वो पुरुष
जो ज़िंदगी के हर कठिन कोने में
अपनी जगह बना लेता है।

कभी-कभी
जब सब सो जाते हैं,
तो वो अपनी शाखें
थोड़ी सी हिला देता है—
जैसे कह रहा हो—
“मैं भी हूँ…
बिना माँगे खिला हुआ।”

वो कनेर है—
खुशबू नहीं,
पर सहारा है।

©®अमरेश सिंह भदौरिया

Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ