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Dr. Srimati Tara Singh
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जीवन की बिसात

 

जीवन की बिसात

हर दिन जब शाम आती है, ढलती धूप देखता हूँ। जीवन के इस पड़ाव पर जहाँ बाल पकने लगे हैं और दृष्टि उन चीज़ों के पार देखने लगी है जो कभी बहुत बड़ी लगा करती थीं, दिन का यह अंतिम पहर एक अजीब सा एकांत रच देता है। सामने बरामदे की मेज़ पर शीशम की पुरानी बिसात बिछी है और बगल में वही घिसा हुआ काठ का बक्सा पड़ा है, जिसकी पीतल वाली कुंडी कब की ढीली पड़ चुकी है। कभी-कभी लगता है कि मनुष्य ने जीवन को समझने के लिए जितने दर्शन, शास्त्र और महाकाव्य रचे, उन सबका निचोड़ बस इसी चौंसठ खानों के तख्ते और इस पुराने बक्से के बीच मौन खड़ा है।

जब तक मोहरे उस बक्से में बंद रहते हैं, वे महज़ तराशी हुई सूखी लकड़ी होते हैं—विशुद्ध काष्ठ। न किसी का कोई नाम होता है, न कोई मान और न कोई पहचान। उनमें न कोई भेद होता है और न ही एक-दूसरे से कोई लाग-डांट। मगर जैसे ही कोई चतुर हाथ उन्हें उठाकर बिसात के खानों पर करीने से सजाता है, जाने कहाँ से उस निर्जीव काठ में एक कृत्रिम चेतना, अधिकार-बोध और अहंकार का संचार होने लगता है। बिसात की हद में पैर रखते ही हर गोटी को उसके नियम, उसकी सीमाएँ और उसकी ताक़त सौंप दी जाती है।

अधिकार मिलते ही उनका स्वभाव और मिज़ाज कैसे बदलता है, यह देखना सचमुच विस्मयकारी है।

प्यादा अपनी एक-एक कदम की लाचार गति पर कुढ़ता ज़रूर है, पर उसकी नज़रें हमेशा किसी को काटने के लिए तिरछी चाल की ताक में रहती हैं। वह आगे तो बढ़ता है, मगर भीतर एक दबी हुई महत्वाकांक्षा लिए कि कभी अंतिम खाने तक पहुँचकर वह भी वज़ीर बन बैठे। घोड़ा अपनी अढ़ाई चाल के टेढ़ेपन पर फूला नहीं समाता; उसे लगता है कि सीधी चालें तो कमज़ोरों के लिए हैं, उसका यह टेढ़ापन ही उसकी सबसे बड़ी मौलिकता है। ऊंट अपनी तिरछी राह के अलावा किसी और दिशा को सच मानने से ही इनकार कर देता है। और वज़ीर? वज़ीर को तो जैसे पूरी सल्तनत की खुली छूट मिल जाती है—जिधर चाहे दौड़े, जितनी दूर चाहे जाए, जिस दिशा में चाहे वार करे। उसके चलने की उद्दंडता देखकर लगता है मानो पूरी बिसात उसी के दम पर सांस ले रही हो।

मगर सबसे विचित्र विडंबना उस राजा की होती है, जिसके नाम पर यह सारा प्रपंच रचा जाता है। जिसके सम्मान की रक्षा में सारे प्यादे एक-एक कर कट जाते हैं, पूरी बिसात पर सबसे कम चलने की स्वतंत्रता उसी के पास होती है। वह अपनी ही सल्तनत में सबसे असहाय, सबसे भयभीत और मात्र एक-एक घर अपनी सांसें बचाता फिरता है; मानो सत्ता का केंद्र अपनी ही रची व्यवस्था का सबसे विवश बंदी हो।

बरसों से दुनिया की इस आपाधापी को देखते हुए लगता है कि यह पूरा समाज ही इसी बिसात का एक विराट रूप है।

हम इंसानों को भी समाज के मंच पर कोई पद, कोई सामाजिक रुतबा, संपत्ति या थोड़ा-सा अधिकार क्या मिल जाता है, हमारा चलना, बोलना और दूसरों को देखना तक बदल जाता है। यह किसी एक व्यक्ति या संस्था की बात नहीं, समूचे मानव-स्वभाव की यही त्रासदी है। अधिकार हाथ में आते ही व्यक्ति के भीतर का वज़ीर अचानक अंगड़ाई लेने लगता है और वह भूल जाता है कि कल तक वह भी किस ज़मीन पर खड़ा था। कोई अपने प्रभाव की सीधी चाल से सामने वाले को दबाना चाहता है, तो कोई संबंधों में कुटिलता की तिरछी चालें चलकर अपनी व्यक्तिगत विजय का उत्सव मनाता है।

मनुष्य यह विस्मृत कर बैठता है कि यह जो चाल चलने का सामर्थ्य, यह जो स्वर का रोब उसे मिला है, यह उसकी अपनी स्थाई पूँजी नहीं है। यह तो महज़ उस समय, उस परिस्थिति और उस व्यवस्था की देन है जिस पर वह उस वक्त खड़ा है। अधिकार का नशा दरअसल उस खालीपन का नाम है, जो बिसात हटते ही बेनकाब हो जाता है।

मगर खेल चाहे जितना उलझा हुआ हो, कितनी भी पैंतरेबाज़ी से भरा हो, सांझ का नियम अटल है।

अंतिम चाल चली जाती है। शह और मात की औपचारिकता पूरी होती है, और एक झटके में उस चौंसठ खानों की हुकूमत का पूरा भरम टूटकर बिखर जाता है। वही हाथ, जिसने कुछ मिनट पहले बड़े आदर से वज़ीर को उठाया था, बाज़ी पलटते ही बिना किसी लिहाज़ के उसे खींचकर उस पुराने बक्से में पटक देता है। मोहरों के आपस में टकराने की वह सूखी खटखटाहट मानो यह मुनादी करती है कि अब खेल सचमुच समाप्त हो चुका है।

उस बक्से का अंधेरा बड़ा निष्पक्ष, शांत और निर्मम होता है। ढक्कन बंद होते ही न कोई वज़ीर बचता है, न राजा और न ही कोई अदना सा प्यादा। वहाँ वज़ीर प्यादे के ऊपर औंधा पड़ा रहता है, घोड़ा अपने सारे टेढ़ेपन को भूलकर राजा के चरणों से सट जाता है, और हाथी चुपचाप एक कोने में सिमट जाता है। सारे अधिकार, सारी पदवियाँ, सारा प्रभाव और वह दंभ—सब उस बक्से के बंद होते ही एक झटके में शून्य हो जाते हैं। बक्से के भीतर सब केवल काठ हैं, विशुद्ध काठ।

दिन ढलने के बाद जिस तरह सांझ का सन्नाटा उतरता है, वैसे ही जीवन का भी एक अंतिम विराम तय है। संसार की बिसात पर हम चाहे जितने बड़े वज़ीर बनकर घूम लें, जितने लोगों को अपनी चालों से मात दे दें, अंत में प्रकृति का वह संदूकचा हम सबके लिए खुलना ही है। चाहे मिट्टी की कब्र हो या श्मशान की शांत राख, वहाँ न कोई पदवी साथ जाती है, न कोई ओहदा और न ही सांसारिक प्रभाव। काठ का यह समूचा खेल अंततः मिट्टी की उसी शाश्वत शांति में विसर्जित हो जाता है। मृत्यु का वह बक्सा किसी का परिचय-पत्र नहीं मांगता।

अब जब भी इस बिसात पर नज़र जाती है, तो अंतस की सारी अकड़ अपने-आप ढीली पड़ जाती है। जीवन मिला है तो अपनी भूमिका पूरी निष्ठा, गरिमा और करुणा के साथ ज़रूर निभानी चाहिए; दायित्व निभाइए, मगर इस बोध के साथ कि यह बिसात उधार की है। हर चाल चलते हुए भीतर यह सुध बनी रहे कि जैसे ही सांझ ढलेगी, हम सबको अपने-अपने मुखौटे और तमगे उतारकर उसी एक बक्से में, एक-दूसरे के कंधे से कंधा मिलाकर हमेशा के लिए सो जाना है।

                                          ✍️अमरेश सिंह भदौरिया

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