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जख्म जब राग बनते हैं

 

जख्म जब राग बनते हैं

तुमने सुना है कभी
उस बाँसुरी का रुदन?
जो हर सुर में
अपना दुःख छुपाती है।

काट कर लाया गया था उसे,
अपने वंशजों की कतार से।
छीन लिए गए उसके पत्ते,
उसकी जड़ें, उसकी मिट्टी।
उसकी देह में छेद कर
बना दी गई वो
सुरों की दासी।

हर शाम
जब कोई उसके छेदों से
प्रेम गीत गाता है,
तब वो रोती है।
हर राग में,
हर तान में
अपना विलाप घोलती है।

लोग कहते हैं —
“क्या मधुर सुर है!”
पर कौन जानता है
कि वो मिठास भी
किसी टूटी आत्मा की आवाज़ होती है।

वो हर रात
अपनी कटाई को याद करती है,
अपनी शाखाओं की
पुरानी छाँव को।
और चाहती है
कि कभी तो
कोई उस पर हाथ न रखे।

बस खामोश पड़ी रहे
अपने जख्मों के साथ।

लेकिन नहीं,
हर बार कोई
उसे उठा लेता है,
और सुरों में
उसका दर्द बुन देता है।

तुम जब अगली बार
बाँसुरी सुनो,
तो ध्यान देना —
उस मीठे स्वर में
छुपा हुआ
वो अनकहा विलाप भी सुनाई देगा।

क्योंकि
संगीत में सबसे सुरीला
हमेशा वही होता है
जिसका दिल टूटा होता।

पर वो रोना संगीत बन गया।
तब जाना —
दर्द जब साँस में ढलता है
तो राग बनता है।

©®अमरेश सिंह भदौरिया

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