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गुरुपूर्णिमा बदलते दौर में गुरुत्व की अग्निपरीक्षा और शाश्वत प्रेरणा

 

गुरुपूर्णिमा बदलते दौर में गुरुत्व की अग्निपरीक्षा और शाश्वत प्रेरणा

"गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥"
— कबीर

भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान केवल पूज्य ही नहीं, अवधारणात्मक रूप से सर्वोच्च रहा है। यह केवल एक धार्मिक भाव नहीं, बल्कि हमारी सभ्यतागत चेतना की वह धुरी है, जहाँ से ज्ञान, नैतिकता और जीवन-मूल्य पीढ़ी दर पीढ़ी प्रवाहित होते आए हैं।

गुरुपूर्णिमा, जो आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है, केवल पंचांग की एक तिथि नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा के चिरंतन प्रकाश का उत्सव है। यह वही दिन है जब हम महर्षि वेदव्यास को स्मरण करते हैं—वह ऋषि जिन्होंने ज्ञान के विराट भंडार को सुव्यवस्थित कर वेदों का विभाजन किया, महाभारत की रचना की और भारतीय दर्शन की अमिट आधारशिला रखी।

भारतीय परंपरा में गुरु ज्ञानदाता मात्र नहीं, वह शिल्पी है जो शिष्य रूपी मिट्टी को तपाकर उसे जीवन की कठोर राहों पर चलने योग्य बनाता है।
वशिष्ठ और राम, संदीपनि और कृष्ण, द्रोण और अर्जुन, चाणक्य और चंद्रगुप्त, रामकृष्ण और विवेकानंद – ये सभी गुरु-शिष्य संबंध हमारे सांस्कृतिक स्मृति-कोष की अमूल्य निधियाँ हैं।

गुरु केवल वह नहीं जो पुस्तकें पढ़ाए, बल्कि वह है जो जीवन जीने की कला सिखाए। उसकी डाँट में सीख होती है, मौन में प्रेरणा और उसके सान्निध्य में जीवन की दिशा।

आज जब सूचना एक क्लिक पर उपलब्ध है और शिक्षा एक "उद्योग" में बदल रही है, तब गुरु और शिष्य के मध्य का वह आत्मिक बंधन कमज़ोर पड़ता जा रहा है।

गुरु अब 'फैकल्टी' बन गया है और शिष्य 'यूज़र'।
गूगल प्रश्नों का उत्तर दे सकता है, पर विवेक नहीं दे सकता। तकनीक सुविधा देती है, पर अनुभव नहीं।

क्या हम गुरु को केवल एक "डाटा प्रोसेसर" मानने लगे हैं?
क्या शिक्षा अब केवल नौकरी की सीढ़ी बन गई है और आत्म-विकास का मार्ग विस्मृत हो चला है?

इन प्रश्नों पर गुरुपूर्णिमा के दिन आत्ममंथन करना न केवल आवश्यक, बल्कि हमारी पीढ़ीगत ज़िम्मेदारी भी है।

गुरुपूर्णिमा केवल आभार प्रकट करने का अवसर नहीं, यह गुरुत्व के पुर्नस्थापन का भी पुनीत दिवस है। इसके लिए सभी की भूमिका अनिवार्य है—

शिक्षण संस्थानों को शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रखकर मूल्याधारित एवं संवादात्मक बनाना होगा।

शिक्षकों को केवल अध्यापक नहीं, जीवन-द्रष्टा बनना होगा – जो न केवल विषय पढ़ाए, बल्कि दृष्टिकोण दे।

विद्यार्थियों को ज्ञान के प्रति श्रद्धा और सीखने की भूख बनाए रखनी होगी।

अभिभावकों और समाज को शिक्षकों को सम्मान देने की परंपरा पुनः जीवित करनी होगी।

गुरु केवल व्यक्ति नहीं, वह विचार है। कभी माता-पिता, कभी एक वाक्य, कभी एक अनुभव, और कभी स्वयं का अंतर्मन – ये सब हमारे जीवन में गुरु बन सकते हैं।

"जब शिष्य तैयार होता है, तब गुरु स्वयं प्रकट होता है।"

गुरुपूर्णिमा केवल अतीत की स्मृति नहीं, भविष्य का पथ भी है। यह हमें याद दिलाती है कि ज्ञान की यात्रा कभी समाप्त नहीं होती, और उस यात्रा में गुरु सदैव पथदर्शक बना रहेगा।

आइए, इस पावन अवसर पर हम अपने सभी गुरुओं को नमन करें – वे जिन्होंने हमें अक्षर सिखाए, और वे जिन्होंने हमें आत्मा को पढ़ना सिखाया।

"गुरु न हों तो पथ भटके, जीवन हो निष्फल।
गुरु ही शुद्धि, सत्य का, प्रथम साक्षात संदल॥"

???? गुरुपूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ!
ज्ञान का यह पर्व आपके जीवन को दिशा, उद्देश्य और प्रकाश प्रदान करता रहे। ????

✍️ अमरेश सिंह भदौरिया

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