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गणतंत्र की गरिमा और वैश्विक झंझावात

 

गणतंत्र की गरिमा और वैश्विक झंझावात

✍️अमरेश सिंह भदौरिया

भारत के इतिहास में 26 जनवरी केवल एक संवैधानिक तिथि नहीं है, बल्कि वह क्षण है जब एक राष्ट्र ने स्वयं को स्वतंत्र होने के साथ-साथ उत्तरदायी भी घोषित किया। यह दिन हमें याद दिलाता है कि आज़ादी केवल सत्ता के हस्तांतरण का नाम नहीं, बल्कि मूल्यों, मर्यादाओं और प्रतिबद्धताओं की स्थापना है। गणतंत्र दिवस का उत्सव यदि केवल औपचारिक आयोजनों, परेडों और सांस्कृतिक झांकियों तक सीमित रह जाए, तो उसका अर्थ अधूरा रह जाता है। इसका वास्तविक स्वर आत्मचिंतन है—अपने लोकतांत्रिक आचरण, संवैधानिक नैतिकता और नागरिक जिम्मेदारियों की ईमानदार पड़ताल।

आज यह आत्मचिंतन और अधिक प्रासंगिक हो उठता है, क्योंकि संपूर्ण विश्व अस्थिरता और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। शक्ति-संतुलन की राजनीति, युद्धों की विभीषिका, आर्थिक असमानता और पर्यावरणीय संकटों ने मानवता के साझा भविष्य को प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर दिया है। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की अवधारणा, जिसे कभी भारतीय चिंतन की आत्मा माना गया, आज वैश्विक प्रतिस्पर्धा और वर्चस्व की होड़ में दबती हुई दिखाई देती है।

ऐसे समय में भारतीय गणतंत्र की भूमिका साधारण नहीं रह जाती। भारत का लोकतंत्र केवल एक शासन प्रणाली नहीं, बल्कि विविधताओं के बीच सहअस्तित्व का जीवंत प्रयोग है। जब विश्व वैचारिक और भौगोलिक खेमों में बंटता जा रहा हो, तब भारत का लोकतांत्रिक ढांचा शांति, संतुलन और संवाद की संभावना प्रस्तुत करता है। परंतु यह संभावना तभी सार्थक होगी, जब हमारी आंतरिक लोकतांत्रिक चेतना सुदृढ़ होगी। बाहरी झंझावातों से अधिक खतरा भीतर के क्षरण से होता है।

आज समाज में बढ़ता वैचारिक ध्रुवीकरण इसी क्षरण का संकेत है। विचारों का मतभेद लोकतंत्र की शक्ति होता है, किंतु जब असहमति को असहिष्णुता से कुचला जाने लगे और संवाद की जगह शोर ले ले, तब गणतंत्र की आत्मा आहत होती है। लोकतंत्र बहुमत का उत्सव भर नहीं, बल्कि अल्पमत की सुरक्षा का नैतिक अनुबंध भी है। असहमति के सम्मान के बिना लोकतंत्र केवल एक खोखला ढांचा बनकर रह जाता है।

इसी तरह आर्थिक विषमता का प्रश्न भी आज गणतंत्र की अंतरात्मा से जुड़ा हुआ है। संविधान ने जिस सामाजिक और आर्थिक न्याय का स्वप्न देखा था, वह अब भी पूर्णता की प्रतीक्षा में है। विकास की चमक-दमक के बीच यदि अंतिम पायदान पर खड़ा नागरिक अदृश्य बना रहे, तो प्रगति का दावा आत्मसंतोष से अधिक कुछ नहीं। गणतंत्र की सार्थकता उसी दिन सिद्ध होगी, जब अवसर जन्म और वर्ग से नहीं, बल्कि प्रतिभा और परिश्रम से निर्धारित होंगे।

डिजिटल युग ने नागरिकता की परिभाषा को और जटिल बना दिया है। तकनीक ने सुविधाएँ दी हैं, किंतु साथ ही निजता, सूचना की विश्वसनीयता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे प्रश्न भी खड़े किए हैं। डेटा की सुरक्षा और दुष्प्रचार के विरुद्ध सजगता आज आधुनिक गणतंत्र की अनिवार्य शर्त बन चुकी है। स्वतंत्रता तभी सुरक्षित रह सकती है, जब वह जिम्मेदारी के साथ जुड़ी हो।

नेल्सन मंडेला का यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है कि स्वतंत्रता का अर्थ केवल जंजीरों से मुक्ति नहीं, बल्कि ऐसी जीवन-पद्धति है जिसमें दूसरों की स्वतंत्रता का सम्मान और संरक्षण निहित हो। यही विचार गणतंत्र की आत्मा है।

इस पूरे परिदृश्य में साहित्य और बौद्धिक विमर्श की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाती है। साहित्य समाज का मौन इतिहास और जाग्रत विवेक होता है। वह प्रश्न करता है, चेतावनी देता है और कभी-कभी आईना दिखाने का साहस भी करता है। एक स्वस्थ गणतंत्र केवल कानूनों से नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक चेतना से जीवित रहता है—और इस चेतना का निर्माण भाषा, विचार और संवेदना से होता है।

आज भारत वैश्विक मंच पर ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज़ बनकर उभर रहा है। जलवायु परिवर्तन जैसे साझा संकटों पर भारत की पहल यह संकेत देती है कि हमारा लोकतंत्र केवल अपनी सीमाओं तक सीमित नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के प्रति उत्तरदायी दृष्टि रखता है। यह दृष्टि हमारी सांस्कृतिक परंपरा और संवैधानिक मूल्यों की संयुक्त देन है।

गणतंत्र दिवस आत्मश्लाघा का नहीं, आत्मावलोकन का अवसर है। बदलती विश्व व्यवस्था में भारत को अपनी पहचान केवल सामर्थ्य के आधार पर नहीं, बल्कि मूल्यों के आधार पर सुदृढ़ करनी होगी। यदि हम विविधता को विभाजन नहीं बनने दें, आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन बनाए रखें और न्याय को नारा नहीं, बल्कि अनुभव बना सकें, तो भारतीय गणतंत्र निश्चय ही 21वीं सदी के वैश्विक संकटों के बीच एक नैतिक प्रकाश-स्तंभ की तरह खड़ा होगा।

आइए, इस गणतंत्र दिवस पर हम यह संकल्प लें कि हम केवल अधिकारों के उपभोक्ता नहीं, बल्कि लोकतंत्र के सजग संरक्षक बनेंगे। क्योंकि गणतंत्र कोई स्थिर संरचना नहीं, बल्कि नागरिक विवेक से निरंतर जीवित रहने वाली साझा यात्रा है।




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