दो मूर्तियाँ, एक पाखंड
आज सुबह जब बाज़ार की तरफ निकला, तो चौराहे पर वही पुराना मंज़र देखने को मिला। नगर पालिका के दो कर्मचारी बाँस की डगमगाती सीढ़ी लगाकर गांधी की प्रतिमा पर जमी साल भर की कालिख और धूल पोंछ रहे थे। थोड़ी ही दूर पर, एक कोने में शास्त्री जी के छोटे से बुत पर गेंदे की पीली माला चढ़ाई जा चुकी थी—सस्ती, कुछ मुरझाई हुई और पूरी तरह रस्म अदायगी से लदी। लाउडस्पीकर पर ‘रघुपति राघव राजा राम’ बज रहा था, और नीचे से गुज़रते लोग अपनी-अपनी मोटरसाइकिलों के हॉर्न बजाते हुए एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में गालियाँ बड़बड़ा रहे थे।
मैं कुछ पल के लिए वहाँ ठिठक गया। अचानक मन के भीतर एक गहरी चुभन उठी। लगा जैसे चौराहे के ये दोनों पत्थर चुपचाप नीचे खड़े इस पूरे हुजूम को देख रहे हों और हम सब नज़रें चुराकर अपने मोबाइल फोन, दफ्तर और बाज़ार की अंधी दौड़ की तरफ भागे जा रहे हों।
हम किस मुँह से इन दोनों का नाम लेते हैं?
अपने गिरेबान में झाँक कर देखें तो हम एक पाखंडी समाज बन चुके हैं। हमने इन दोनों महापुरुषों के साथ सबसे शातिर चाल यह चली कि हमने उन्हें इंसान से उठाकर ‘देवता’ बना दिया। किसी को देवता घोषित कर देना हमारे समाज की सबसे सुविधाजनक चालाकी है। जैसे ही आपने गांधी को ‘महात्मा’ और शास्त्री को ‘तपस्वी’ कहकर आकाश में बैठा दिया, वैसे ही आप अपने दायित्वों से मुक्त हो गए। फिर आप आसानी से कह सकते हैं—"भाई, वे तो महापुरुष थे, अवतारी थे, हम तो घोर कलिकाल के मामूली इंसान हैं, हम उनके रास्ते पर कैसे चल सकते हैं!" यह तर्क हमें रोज़मर्रा की बेईमानी, काहिली और नफ़रत के साथ जीने का नैतिक लाइसेंस दे देता है।
आज की नई पीढ़ी को देखिए। मैं जब अपने आस-पास के नौजवानों को देखता हूँ, तो भीतर से एक टीस उठती है। यह पीढ़ी तकनीक के उस भंवर में फँसी है जहाँ संपर्क तो अनंत हैं, मगर संवाद शून्य है। चौबीसों घंटे हाथ में चमकती स्क्रीन पर एक ऐसी दुनिया रची गई है जहाँ सफलता का एकमात्र पैमाना यह है कि आपके पास महँगी गाड़ी कौन-सी है, आपकी जेब में गैजेट कौन-सा है और आपके बैंक खाते का आकार क्या है। इस अंतहीन उपभोगवादी हवस ने हमारे भीतर से संतोष नाम की चीज़ को नोच कर फेंक दिया है। लोग चौबीसों घंटे तनाव में हैं, अवसाद में हैं, केवल इसलिए कि पड़ोसी या सहकर्मी के पास उनसे बेहतर चीज़ है।
ऐसे बीमार समय में जब मैं शास्त्री जी के फटे कुर्ते और उनकी पुरानी गाड़ी की किस्तों के बारे में सोचता हूँ, तो हैरानी नहीं होती, अपने समय की रीढ़विहीनता पर शर्म आती है। शास्त्री जी का वह फटा कुर्ता कोई मजबूरी नहीं थी, वह इस बात का ऐलान था कि इंसान की गरिमा उसके कपड़ों या पद से तय नहीं होती, उसकी निष्ठा और चरित्र से तय होती है। उन्होंने देश से हफ्ते में एक दिन उपवास रखने की अपील करने से पहले खुद अपने घर में चूल्हा जलाना बंद किया था, ताकि देख सकें कि उनके अपने बच्चे भूखे रह सकते हैं या नहीं। आज ज़रा कल्पना कीजिए—क्या हमारे आज के हुक्मरानों, अफसरों या यहाँ तक कि हम जैसे आम नागरिकों में भी इतनी नैतिक हिम्मत बची है? आज तो हालत यह है कि कोई रेल पटरी से उतर जाए या संस्थाएँ चरमरा जाएँ, हम अपनी गलती का ठीकरा भी अपने मातहत किसी अदने से कर्मचारी के सिर मढ़कर किनारा कर लेते हैं। उस दौर में एक आदमी बिना किसी के माँगे रेल मंत्री के पद को तिनके की तरह छोड़ देता है क्योंकि उसकी अंतरात्मा ने उसे धिक्कारा था।
और गांधी? आज हमने गांधी को केवल स्वच्छता अभियान के गोल चश्मे या सरकारी दफ्तरों के सालाना कैलेंडरों तक सीमित कर दिया है। बापू की अहिंसा कोई कायरता या कमज़ोरी का दर्शन नहीं थी; वह तो असीम आत्मबल की माँग करती थी। आज जब सोशल मीडिया पर एक मामूली टिप्पणी या राजनीतिक असहमति पर लोग हिंसक हो उठते हैं, किसी की माँ-बहन को गालियाँ बकने लगते हैं, और किसी को भी देशद्रोही या शत्रु करार दे देते हैं, तब समझ आता है कि हम गांधी से कितने प्रकाश वर्ष दूर चले गए हैं। गांधी ने उस ब्रिटिश हुकूमत से लोहा लिया जिसके राज्य में सूरज नहीं डूबता था, मगर उन्होंने कभी किसी अंग्रेज़ व्यक्ति से व्यक्तिगत द्वेष नहीं पाला। उन्होंने सिखाया था कि बुराई से लड़ो, बुरे व्यक्ति से नहीं। आज हमारी हालत यह है कि हम विचार से नहीं लड़ते, हम सामने वाले के अस्तित्व को ही मिटा देने पर आमादा हो जाते हैं।
सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हमने इन दोनों को अपनी सुविधानुसार दो विरोधी खेमों में बाँट भी दिया है। किसी को गांधी पसंद हैं तो वह शास्त्री जी के स्वाभिमान को नज़रअंदाज़ करता है, किसी को शास्त्री जी भाते हैं तो वह गांधी को कोसने में अपनी ऊर्जा खपाता है। हम भूल जाते हैं कि दोनों एक ही नैतिक ज़मीन के दो छोर थे—एक ने स्वाधीनता का नैतिक आधार तैयार किया, तो दूसरे ने स्वतंत्र भारत को अपने पैरों पर खड़े होने का आत्मसम्मान दिया।
गांधी का चरखा आज की सदी का रोज़गार नहीं हो सकता, और न ही शास्त्री जी की धोती आज के युवा का पहनावा हो सकती है। इसकी ज़रूरत भी नहीं है। समय बदलता है, साधन बदलते हैं, मगर बुनियादी मानवीय मूल्य कभी पुराने नहीं पड़ते।
गांधी का वह साहस हमें आज भी चाहिए, जिसके बल पर उन्होंने ‘सत्य के प्रयोग’ में अपनी कमजोरियों और भूलों को खुले पन्नों पर स्वीकार किया था। आज जब हर इंसान दूसरों को धोखा देने से पहले खुद को धोखा दे रहा है और एक झूठी, मुकम्मल छवि जीने के चक्कर में भीतर से खोखला हो रहा है, तब बापू की वह पारदर्शिता ही सच्ची मुक्ति का मार्ग दिखा सकती है।
और शास्त्री जी का वह अडिग स्वाभिमान आज भी प्रासंगिक है, जिसने 1965 के युद्ध और अन्न संकट के समय अमेरिकी धौंस को ठुकराते हुए पूरे देश को यह सिखाया था कि आत्मसम्मान से जीने के लिए आधी रोटी खाना भी गंवारा है, मगर झुकना मंज़ूर नहीं।
आज 2 अक्टूबर है। शाम होते-होते चौराहों पर बजी शहनाइयाँ और लाउडस्पीकर शांत हो जाएँगे। मालाओं के फूल सूखकर सड़क की धूल में मिल जाएँगे। कल सुबह 3 अक्टूबर को जब हम अपने बिस्तरों से उठेंगे, तो क्या हम फिर से उसी नफ़रत, उसी लालच और उसी अंधी होड़ की चक्की में पिसने चले जाएँगे?
अगर हाँ, तो फिर यह पाखंड बंद होना चाहिए। मूर्तियों पर फूल चढ़ाने का हक़ केवल उन्हें है जो उन मूर्तियों में कैद विचारों को अपने आचरण में उतारने का थोड़ा-बहुत जोखिम उठा सकें। जब तक हम किसी कमज़ोर की आवाज़ सुनने का धैर्य नहीं जुटाते, जब तक हम अपनी सुविधा के आगे देश और समाज के हित को तरजीह देना नहीं सीखते, और जब तक हम असहमति के बीच भी प्रेम की भाषा नहीं बोल पाते—तब तक ये जयंतियाँ सिर्फ एक सरकारी छुट्टी हैं, और ये दोनों महापुरुष हमारे अंतर्मन के पाखंड के दो मूक साक्षी।
अमरेश सिंह भदौरिया
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY