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धुंधला दर्पण

 

धुंधला दर्पण

मैंने देखा ख़ुद को
एक पुराने दर्पण में—
धुंधला, धूल सना,
टुकड़ों में बँटा हुआ।

चेहरा तो मेरा ही था,
पर आँखें अनजानी सी लगीं,
होंठ मुस्कुरा रहे थे,
पर भीतर कुछ रो रहा था।

ये दर्पण,
केवल काँच नहीं था—
ये मेरी यादों की परतें थीं,
अनकहे सवालों की सिलवटें,
और उन निर्णयों की दरारें
जिन्हें समय की हथौड़ी ने
बेआवाज़ तोड़ा।

मैं उसे पोंछना चाहता था,
साफ़ करना,
अपनी असल सूरत देखना चाहता था,
पर डरता था—
कहीं जो दिखे
वो मुझसे भी अधिक अपरिचित न हो!

कभी-कभी सोचता हूँ,
दर्पण ही धुंधला नहीं,
शायद दृष्टि ही धुंधलाई है,
या फिर
हम सब जीते हैं
आधे सच के साथ,
आधी छवि के साथ।

धुंधला दर्पण
मुझसे कहता है—
पहले अपने भीतर उतरो,
तब शायद मैं
तुम्हारा असली चेहरा दिखा सकूँ।

©®अमरेश सिंह भदौरिया 

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