दंड दो मुझे
दंड दो मुझे,
कि मैं फिर लौट आया
तुम्हारे मौन की सीमा लाँघकर।
जबकि तय था —
तुम्हारी देह, तुम्हारा नाम,
और तुम्हारी स्मृति को
अंधेरे में गिरवी रख कर
मैं एक निष्पृह मनुष्य बन जाऊँगा।
मैंने कितनी बार
अपनी देह के भीतर
तुम्हारी छाया को कुचलने की कोशिश की,
पर हर बार
वो और गहरे उतर आई
मेरे रक्त के कण-कण में।
तुम न दो कोई आहट।
न कोई दृष्टि।
न कोई शब्द।
बस यूँ ही अनदेखा कर देना
जैसे समय अनदेखा करता है
किसी टूटे हुए दीपक की आख़िरी लौ।
मैं जानता हूँ —
प्रेम कभी प्रत्यक्ष नहीं होता।
वो घटता है भीतर,
एक अदृश्य रेखा की तरह
जो किसी नाम, किसी पहचान की मोहताज नहीं।
दंड दो मुझे,
कि मैं फिर ढूँढ़ने निकला
तुम्हारी अधूरी बातों में
कोई अर्थ, कोई उत्तर,
जबकि मौन ही
तुम्हारा अंतिम निर्णय था।
तुम रहो अपनी अनभिज्ञता की दुनिया में।
मैं जी लूँगा
अपने अधूरे प्रश्नों का ताप लेकर।
हर दिन, हर रात
मैं अपनी हथेली में
तुम्हारे मौन की राख भरकर
अपने शब्द लिखूँगा।
तुम नहीं समझोगी,
पर मैं जानता हूँ —
प्रेम का सबसे प्रामाणिक चेहरा
अनकहा होता है।
और दंड ही है
इस जन्म की सबसे गुप्त प्रार्थना।
तो दंड दो मुझे।
कि मैं फिर लौट आया
बिन निमंत्रण
तुम्हारे स्मृतियों के बंद आँगन में।
©®अमरेश सिंह भदौरिया
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