ढलती शाम
ढलती शाम—
न तो सिर्फ़ सूरज का विदा होना है,
और न ही अंधेरे की दस्तक।
यह उस उम्र की तरह है
जो अब प्रश्न कम, अनुभव अधिक करती है।
पेड़ों की परछाइयाँ लंबी हो चली हैं,
जैसे किसी वृद्ध की स्मृतियाँ—
धीरे-धीरे समय पर टिकती हुईं,
मगर धुँधलके में झरती-सी।
पंछी लौटते हैं
अपने घोंसलों की ओर,
जैसे हम भी भागते हैं
अपने भीतर की शांति की तलाश में।
ढलती शाम,
सिर्फ़ एक दृश्य नहीं—
यह चेतावनी है कि
सब कुछ शाश्वत नहीं होता।
फिर भी, इसमें सौंदर्य है—
एक शांत गरिमा,
जो दिनभर के शोर के बाद
सिर्फ़ मौन से संवाद करती है।
ढलती शाम सिखाती है—
कि उजास का मूल्य अंधेरे से ही समझ आता है,
और हर अंत,
एक नई शुरुआत की भूमिका है।
©®अमरेश सिंह भदौरिया
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