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चुप्पी का विद्रोह

 

चुप्पी का विद्रोह

✍️अमरेश सिंह भदौरिया

गाँव का नाम था बिसनपुर. अब वह पहले जैसा भोला गाँव नहीं रहा था. सड़कें आ गई थीं, बिजली आ गई थी, मोबाइल हर हाथ में था. मगर आदमी अब भी अधूरा था. जरूरतें बढ़ी थीं और इंसान छोटा हो गया था.

रामस्वरूप उसी गाँव का आदमी था. उम्र पचास के पार. शरीर झुका हुआ. मगर आँखों में एक सीधी आग. लोग उसे पगला कहते थे. क्योंकि वह हर गलत बात पर बोल देता था. और सच बोलना इस गाँव में सबसे बड़ी बेवकूफी मानी जाती थी.

गाँव का प्रधान था रघुवीर सिंह. कुर्सी पर बैठते ही उसकी आवाज बदल जाती थी. जैसे आदमी नहीं, हुकूमत बोल रही हो. सरकारी योजनाएँ उसके लिए दुकान थीं. और गाँव वाले ग्राहक नहीं, मजबूर खरीदार.

सावन की दोपहर थी. चारों तरफ कीचड़. नालियाँ बजबजा रही थीं. मच्छरों का झुंड जैसे हर घर पर पहरा दे रहा हो. उसी गली में बुधिया का घर था.

छोटू पाँच दिन से बुखार में तप रहा था. आँखें धँसी हुई. साँस तेज. शरीर जलता हुआ. बुधिया का कलेजा हर साँस के साथ काँप रहा था.

वह अस्पताल गई थी. लाइन में खड़ी रही. डॉक्टर आया, देखा, पर्ची लिख दी. दवा बाहर से लानी थी. जेब खाली थी.

वह लौट आई. फिर आशा बहू के पास गई. उसने कंधे उचकाकर कहा. हम क्या करें. दवा तो बाजार से ही आएगी.

तीन दिन तक छोटू तड़पता रहा. गाँव वाले देखते रहे. किसी ने कहा भगवान ठीक करेगा. किसी ने कहा समय खराब है. मगर किसी ने जेब नहीं टटोली.

क्योंकि बुधिया ने एक बार प्रधान की बात काट दी थी. और इस गाँव में यह अपराध माफ नहीं होता.

आखिर वह पंचायत भवन पहुँची.

रघुवीर सिंह कुर्सी पर पसरा हुआ था. मोबाइल पर हँस रहा था. आसपास बैठे लोग उसकी हँसी पर हँस रहे थे. जैसे उनकी अपनी कोई हँसी न हो.

बुधिया ने दरवाजे की चौखट पकड़कर धीमे से आवाज लगाई.

प्रधान जी. ओ प्रधान जी.

अंदर कुर्सी पर अधलेटा रघुवीर पान चबाते हुए बैठा था. उसने आलस से गर्दन उठाई. आँखें सिकुड़ीं. होंठ तिरछे हुए.

हाँ बोल. फिर आ गई. क्या है अब. हरामखोरी की भी हद होती है.

बुधिया सकुचाकर दो कदम आगे बढ़ी. दोनों हाथ जोड़ लिए. आवाज काँप रही थी.

प्रधान जी. बच्चा मर जाएगा. तीन दिन से बुखार में तप रहा है. दवा के लिए कुछ मदद कर दीजिए. भगवान आपका भला करेगा.

रघुवीर एकदम ठठाकर हँस पड़ा. जैसे कोई बड़ा तमाशा देख लिया हो. फिर अंदर बैठे लोगों की तरफ गर्दन घुमाकर जोर से बोला.

अरे सुनो जरा. ये फिर आ गई. जैसे हम इसके बाप का खजाना लेकर बैठे हैं.

उसने मुँह में भरा पान किनारे थूका. फिर नफरत से बुधिया को ऊपर से नीचे तक देखा.

काम धंधा कुछ है नहीं. बस मुँह उठाकर चली आती है. रोना-धोना लगा देती है. और ऊपर से पहले बड़ी तेज जुबान चलाती थी. अब आई है हाथ फैलाने.
फिर गाली बकते हुए गरजा.

जब चौपाल में खड़ी होकर अकड़ दिखा रही थी तब याद नहीं आया कि जरूरत भी पड़ सकती है. अब समझ में आ रही है अपनी औकात.
उसकी आवाज में तिरस्कार ही नहीं, पुरानी खुन्नस भी घुली हुई थी.

बुधिया चुप रही. उसकी आँखें भर आई थीं, पर उसने आँसू गिरने नहीं दिए. होंठ भींचे रहे. वह जानती थी. अब एक शब्द भी निकला तो यह आदमी उसे और कुचल देगा.

रघुवीर कुर्सी से थोड़ा आगे झुक आया. आँखें तरेरकर बोला.

मदद चाहिए. तो पहले सीधी बन. जा. कागज बनवा. सरकारी योजना में नाम लिखवा. और सुन. हमारी सिफारिश के बिना एक पैसा नहीं मिलेगा. समझी.
उसने उँगली उठाकर जैसे हुक्म सुनाया.

यहाँ यूँ ही नहीं मिलता कुछ. लाइन लगानी पड़ती है. और तेरे जैसे लोगों को तो और भी समझाना पड़ता है.
फिर अचानक उसका चेहरा कठोर हो गया. आवाज और कड़ी हो गई.

अब खड़ी क्या है यहाँ. जा. दिमाग मत खराब कर. नहीं तो अभी ऐसा भगा दूँगा कि रास्ता याद नहीं रहेगा.

उसने हाथ झटककर इशारा किया. जैसे कोई कुत्ता भगाता हो.

बुधिया वहीं खड़ी रही. एक पल को उसके पैर जैसे जमीन में धँस गए. उसने धीरे से बच्चे को अपने सीने से और कस लिया. फिर बिना कुछ बोले सिर झुका लिया.

उसका चुप रहना ही उसकी आखिरी ताकत थी. और वही अब धीरे-धीरे टूट रही थी.

उसी समय रामस्वरूप अंदर आया.

उसने दरवाजे पर खड़ी बुधिया को देखा. फटा आँचल. सूजी आँखें. गोद में तपता हुआ बच्चा.

फिर उसकी नजर रघुवीर पर गई.

वह कुछ क्षण चुप रहा. जैसे भीतर कुछ तौल रहा हो. फिर धीमे मगर ठोस स्वर में बोला.

इतनी भी क्या अकड़ है प्रधान. बच्चा मर रहा है. और तुम तमाशा बना रहे हो.

रघुवीर जैसे जलते तवे पर पानी पड़ गया हो. झटके से कुर्सी से उठ बैठा. आँखें लाल हो गईं.

ओए रामस्वरूप. तू फिर आ गया बीच में टाँग अड़ाने. बड़ा हमदर्द बनता है गाँव का.

उसने गाली दी. फिर आगे बढ़कर उँगली तान दी.

अपना काम कर चुपचाप. नहीं तो ऐसी ठुकाई करूँगा कि सारी समाज सेवा बाहर आ जाएगी. समझा कि नहीं.

रामस्वरूप जरा भी नहीं डिगा. वह वहीं खड़ा रहा. उसकी नजर सीधी रघुवीर की आँखों में थी.

ठुकाई से डरता तो सच बोलना छोड़ देता. पर बच्चा सच में मर रहा है. यह भी देख लो एक बार.

रघुवीर तिलमिला उठा. उसने मेज पर जोर से हाथ पटका.

बहुत जुबान चलने लगी है तेरी. लगता है भूल गया है किससे बात कर रहा है.

फिर गुस्से में दहाड़ा.

यहाँ का कानून मैं हूँ. मेरी मर्जी के बिना इस गाँव में एक पत्ता नहीं हिलता. और तू मुझे सिखाएगा इंसानियत.

उसने फिर गाली दी.

भाग यहाँ से. नहीं तो अभी लोगों को बुलाकर नंगा करा दूँगा तेरी इज्जत.

बुधिया सहमकर एक कदम पीछे हट गई. उसने रामस्वरूप की तरफ देखा. उसकी आँखों में डर भी था और एक उम्मीद की हल्की सी रौशनी भी.

रामस्वरूप ने उसकी तरफ बिना देखे ही कहा.

तू खड़ी रह. कहीं मत जा.

फिर वह एक कदम आगे बढ़ा. आवाज अब और साफ थी.

कानून बनने से कोई भगवान नहीं हो जाता. और कुर्सी हमेशा नहीं रहती.

पंचायत भवन में एक पल को सन्नाटा जम गया.

रघुवीर के चेहरे पर गुस्सा और अपमान एक साथ उभर आए. उसकी मुट्ठियाँ भिंच गईं.

और बुधिया. वह अब भी चुप थी. लेकिन उसकी चुप्पी में इस बार सिर्फ बेबसी नहीं थी. कुछ टूटकर जाग रहा था.

रघुवीर की नसें तन गईं. उसने चारों तरफ नजर दौड़ाई. बाहर खड़े दो-तीन लोग अब पंचायत भवन में झाँकने लगे थे.

उसने ऊँची आवाज में पुकारा.

अरे ओ भोला. जरा इधर आना. देखो जरा इसको. बहुत नेता बन रहा है आजकल.

भोला और दो आदमी अंदर आ गए. माहौल अचानक भारी हो गया.

रघुवीर ने रामस्वरूप की तरफ इशारा किया.

समझा दो इसे. ज्यादा उड़ने लगा है. गाँव का माहौल खराब कर रहा है.

भोला ने संकोच से रामस्वरूप को देखा. फिर धीमे से बोला.

अरे रहने भी दो प्रधान. जाने दो इसे.

रघुवीर भड़क उठा.

तुम लोग भी अब मुझे सिखाओगे. किसे रखना है किसे नहीं.

फिर गाली देते हुए गरजा.

सबके सब सिर चढ़ गए हैं. एक को ढील दो तो पूरा गाँव नाचने लगता है.

रामस्वरूप ने एक कदम आगे बढ़कर कहा.

गाँव नाच नहीं रहा. अब बोलना सीख रहा है.

भीड़ में खड़े लोगों के चेहरों पर हल्की हलचल हुई. कोई कुछ बोला नहीं, पर नजरें बदलने लगीं.

रघुवीर ने यह बदलाव पकड़ लिया. उसकी आवाज और कड़ी हो गई.

देख रहा हूँ मैं. सबकी हिम्मत बढ़ रही है. लगता है अब डंडा चलाना पड़ेगा.

उसने भोला से कहा.

खड़े क्या हो. निकालो इसे यहाँ से.

भोला हिचकिचाया. उसके कदम आगे बढ़े, पर रुक गए. उसने रामस्वरूप की तरफ देखा. फिर नीचे नजर झुका ली.

रामस्वरूप ने धीमे स्वर में कहा.

हाथ लगाकर देखो. फिर मत कहना बताया नहीं.

आवाज ऊँची नहीं थी. पर उसमें अजीब ठहराव था. जैसे डर से परे कोई सच्चाई खड़ी हो.

कुछ पल के लिए सब जड़ हो गए.

बुधिया ने पहली बार सिर उठाकर चारों तरफ देखा. उसे लगा जैसे हवा बदल रही है. धीमी सही, पर दिशा बदल रही है.

रघुवीर अब अकेला पड़ता महसूस कर रहा था. उसका गुस्सा अब झुंझलाहट में बदलने लगा.

उसने आखिरी कोशिश की.

ठीक है. बहुत हमदर्दी उमड़ रही है ना. ले जाओ इसे. तुम ही कर लो इसका इलाज. देखता हूँ कितना चलता है तुम्हारा समाज सुधार.

रामस्वरूप ने बिना जवाब दिए बुधिया की तरफ देखा.

चल. अस्पताल चलते हैं.

बुधिया के कदम काँपे. फिर धीरे-धीरे वह आगे बढ़ी. बच्चे को कसकर सीने से लगाए.

भीड़ अपने आप रास्ता छोड़ती गई.

रघुवीर खड़ा रह गया. उसकी मुट्ठियाँ अब भी भिंची थीं. पर सामने से गुजरते उन लोगों के बीच उसकी आवाज कहीं खो गई थी.

पंचायत भवन में पहली बार सन्नाटा नहीं, एक अनकहा विरोध ठहर गया था.

गाँव से अस्पताल तक का रास्ता लंबा नहीं था, पर उस दिन हर कदम भारी था.

रामस्वरूप आगे-आगे चल रहा था. बुधिया पीछे. गोद में बच्चा अब ढीला पड़ता जा रहा था. उसका शरीर तप रहा था, और रोने की ताकत भी जैसे खत्म हो गई थी.

सरकारी अस्पताल के बाहर भीड़ थी. कोई पर्ची बनवा रहा था. कोई डॉक्टर को खोज रहा था. कोई लाइन को कोस रहा था.

रामस्वरूप सीधे खिड़की पर पहुँचा.

एक पर्ची बना दो. बच्चा बहुत गंभीर है.

अंदर बैठे बाबू ने बिना सिर उठाए कहा.

लाइन में लगो. सबको जल्दी है यहाँ.

रामस्वरूप ने कड़ा स्वर लिया.

बच्चा मर जाएगा. पहले देख लो.

बाबू ने चिढ़कर नजर उठाई.

हर कोई यही बोलता है. यहाँ कोई मुफ्त की सेवा नहीं चल रही. नियम से चलो.

बुधिया घबराकर बोली.

बाबू जी. रहम कर दीजिए. बाद में पैसा दे देंगे.

बाबू हँसा.

अरे पहले जान तो बचा लो. फिर पैसा देना. अभी तो पर्ची बनवाओ.

रामस्वरूप ने जेब टटोली. कुछ मुड़े-तुड़े नोट निकाले. खिड़की पर रख दिए.

जल्दी बनाओ.

नोट देखते ही बाबू का रवैया ढीला पड़ा. उसने फॉर्म खींचा और जल्दी-जल्दी लिखने लगा.

पर्ची बनते ही वे अंदर भागे.

अंदर वार्ड में डॉक्टर कुर्सी पर बैठे मोबाइल देख रहे थे. एक नर्स पास में खड़ी थी.

रामस्वरूप ने लगभग विनती करते हुए कहा.

डॉक्टर साहब. बच्चा देख लीजिए. हालत बहुत खराब है.

डॉक्टर ने बिना जल्दी दिखाए सिर उठाया.

पहले पर्ची दिखाओ.

पर्ची देखी. फिर बच्चे की तरफ नजर डाली. उसने नर्स से कहा. तापमान देखो. नर्स ने थर्मामीटर लगाया. फिर धीमे से बोली.

बहुत तेज बुखार है. डॉक्टर ने लापरवाही से कहा. इंजेक्शन लगा दो. और दवा लिख देता हूँ.

बुधिया डर गई.
साहब. बच जाएगा ना.

डॉक्टर ने सीधा जवाब नहीं दिया. बस कागज पर कुछ लिखता रहा.

नर्स ने इंजेक्शन तैयार किया. बच्चा हल्का सा सिहर उठा. फिर फिर से ढीला पड़ गया.

रामस्वरूप ने देखा. उसकी मुट्ठियाँ भींच गईं. कुछ और कीजिए डॉक्टर साहब.

डॉक्टर ने इस बार थोड़ी गंभीरता से देखा. फिर बोला.
बहुत देर से लाए हो. पहले क्यों नहीं दिखाया.

यह सवाल जैसे सीधे बुधिया के सीने में धँस गया. वह कुछ बोल नहीं पाई.

रामस्वरूप ने धीमे से कहा.
गाँव से आए हैं. साधन नहीं थे.

डॉक्टर ने गहरी साँस ली. ठीक है. भर्ती करना पड़ेगा. देखना पड़ेगा रात तक क्या हालत रहती है.

बुधिया की आँखों में हल्की सी उम्मीद जगी.
बचा लीजिए साहब.

नर्स ने बच्चे को ले जाकर बेड पर लिटाया. एक सलाइन चढ़ाई गई. फिर दूसरी भी लगा दी गई.

कमरे में दवाइयों की गंध थी. मशीनों की हल्की आवाज. और उस सबके बीच एक माँ की धड़कनें.

रामस्वरूप पास खड़ा रहा. चुप. पर सतर्क.
उस रात सिर्फ इलाज नहीं चल रहा था.

वार्ड की पीली रोशनी में बहुत कुछ एक साथ घट रहा था. एक तरफ लोहे के उस बिस्तर पर पड़ा छोटा सा शरीर था, जो हर साँस के साथ जैसे लड़ रहा था. दूसरी तरफ एक माँ थी, जिसकी आँखों में नींद नहीं, बस डर और प्रार्थना ठहरी हुई थी.

बुधिया बच्चे के सिर पर हाथ फेरती रही. उसके होंठ बुदबुदा रहे थे. कभी भगवान का नाम. कभी बच्चे का. कभी खुद से सवाल. कि देर कहाँ हो गई. गलती कहाँ हो गई.

सलाइन की बूँदें एक-एक करके गिर रही थीं. जैसे समय टपक रहा हो. हर बूँद के साथ उम्मीद भी बँधी थी और डर भी.

पास के बिस्तरों पर और भी लोग थे. कोई कराह रहा था. कोई चुपचाप छत देख रहा था. हर चेहरे पर अपनी-अपनी लड़ाई लिखी थी. पर उस रात बुधिया की लड़ाई सबसे निजी थी. और सबसे बड़ी भी.

डॉक्टर बीच-बीच में आता. नब्ज देखता. कुछ निर्देश देकर चला जाता. उसके चेहरे पर आदत थी. जैसे यह सब रोज का हो.

पर बुधिया के लिए यह पहली बार था. और शायद आखिरी भी हो सकता था.

रामस्वरूप दरवाजे के पास खड़ा था. वह बार-बार घड़ी देखता. फिर बच्चे की तरफ. फिर बुधिया की तरफ. उसके भीतर गुस्सा भी था. और असहायता भी. वह जानता था कि यहाँ आवाज ऊँची करने से कुछ नहीं बदलेगा. यहाँ सब कुछ कागज, दवा और समय के हाथ में था.

रात धीरे-धीरे गहराती गई. बाहर सन्नाटा था. अंदर मशीनों की हल्की आवाज और कभी-कभी किसी की दबती हुई सिसकी.

और उसी सन्नाटे में दो ताकतें आमने-सामने खड़ी थीं.
एक तरफ एक गरीब की जिद थी. कि वह अपने बच्चे को किसी भी हाल में बचा लेगी.

दूसरी तरफ व्यवस्था की ठंडी दीवार थी. जहाँ हर दर्द एक फाइल बन जाता है. और हर चीख एक प्रक्रिया में बदल जाती है.

उस रात फैसला सिर्फ बीमारी का नहीं होना था.
यह तय होना था कि उम्मीद कितनी देर तक टिक सकती है. और व्यवस्था कितनी देर तक अनसुनी कर सकती है.

उधर गाँव में रात अलग तरह से उतर रही थी.

पंचायत भवन पर कुर्सियाँ पड़ी थीं, पर बातों में पहले जैसा हल्कापन नहीं था. लोग बैठे तो थे, पर हर किसी के मन में वही दिन का दृश्य अटका हुआ था.

भोला ने धीमे से कहा.
आज जो हुआ... ठीक नहीं हुआ.

किसी ने सीधा जवाब नहीं दिया. बस एक बुजुर्ग ने बीड़ी सुलगाते हुए लंबी साँस छोड़ी.

गरीब की आह सीधी लगती है.
एक और आदमी बोला.

बुधिया कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाती थी. मजबूरी ही रही होगी.

बात धीरे-धीरे खुलने लगी. जैसे दबा हुआ कुछ ऊपर आ रहा हो.

उधर रघुवीर अपने आँगन में अकेला बैठा था. सामने वही कुर्सी. वही दीवार. पर आज सब कुछ अलग लग रहा था.

दिन भर की बात उसके कानों में गूँज रही थी. रामस्वरूप की आवाज. लोगों की नजरें. वह एक पल को भी सहज नहीं हो पा रहा था.

उसने खुद से जैसे सफाई दी.
गलत क्या किया मैंने. नियम ही तो बताया था.
पर भीतर से कोई जवाब नहीं आया.
उसने खीजकर लोटा उठाया, पानी पिया. फिर जोर से रख दिया.

सब सिर चढ़ गए हैं.
पर इस बार उसकी आवाज में पहले वाली ठसक नहीं थी.

चौपाल पर फिर आवाज उठी.
अगर कल किसी के घर ऐसा हो जाए तो. क्या हम भी यूँ ही खड़े रहेंगे.

एक युवक बोला.
नहीं. अब नहीं.

धीरे-धीरे कुछ सिर हिले. सहमति में. बिना शोर के.
गाँव में कोई ऐलान नहीं हुआ. कोई नारा नहीं लगा.
पर उस रात एक खामोश फैसला जरूर हुआ.

कि अब हर बार चुप नहीं रहा जाएगा.
और उसी खामोशी में रघुवीर की सत्ता की जड़ें हल्की-हल्की ढीली पड़ने लगीं.

क्योंकि सत्ता कभी आवाज से नहीं, विश्वास से चलती है.
और जब विश्वास चुपचाप टूटता है, तो सबसे ऊँची कुर्सी भी भीतर से खाली हो जाती है.

उस रात गाँव ने शोर नहीं किया था.
पर इंसानियत ने धीरे से सिर उठाया था.

और जहाँ इंसानियत जाग जाती है,
वहीं से बदलाव की असली शुरुआत होती है.

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