चाँदनी रात
चाँद फिर निकला है,
ठीक वैसा ही —
जैसे तुम जाते वक़्त
मेरे माथे पर हाथ रख के बोले थे,
"जल्दी लौटूँगा।"
पर वक़्त बीत गया पिया,
और चाँद
अब मेरे आँचल पर
सिर्फ़ उजास नहीं,
विरह का सफ़ेद सन्नाटा बिछाता है।
आँगन की तुलसी सूखी नहीं है,
पर उसमें अब वो हरियाली नहीं,
जो तुम्हारे बोलों से आती थी।
चूल्हा जलता है रोज़,
पर रोटियाँ अब गोल नहीं बनतीं,
जैसे मेरे मन की परिधि
तुम्हारे बिना टूटी हुई हो।
गाय का बछड़ा
बार-बार दरवाज़े तक देखता है,
जैसे उसे भी यकीन हो
कि कोई आएगा—
लेकिन अब पगडंडी तक चुप है,
और चाँदनी भी।
ये रातें अब सौंदर्य नहीं लातीं,
ये पूछती हैं—
"जिसके लिए आँखें सजाई थीं,
वो कब लौटेगा?"
मैं चाँद से बात करती हूँ
पर वो जवाब नहीं देता,
बस हर रात
तुम्हारी याद की तरह
आकर बिखर जाता है छत पर।
पिया,
अब तुम ही बताओ—
इस चाँदनी को सुंदर कहूँ,
या अकेली?
©®अमरेश सिंह भदौरिया
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